फूस की झोपड़ी में जिंदगी, आवास योजना में नाम नहीं — चटनियां पंचायत का जितेंद्र साह प्रशासन से गुहार लगाता रहा, पर सुनवाई नहीं


कांडी (प्रतिनिधि):
सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं — अबुआ आवास, प्रधानमंत्री आवास और अंबेडकर आवास — गरीबों को पक्का घर देने के उद्देश्य से चलाई जा रही हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चटनियां पंचायत के पिपराडीह गांव निवासी जितेंद्र साह आज भी फूस की झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं।

जितेंद्र साह, जो अपने दिवंगत पिता स्वर्गीय शंभू साह की विधवा मां, पत्नी और तीन छोटे बच्चों के साथ रहते हैं, बरसात के इस मौसम में भी छत के नाम पर केवल फूस और पॉलिथीन का सहारा लिए हुए हैं। उनका कहना है कि उन्होंने सरकारी सर्वे में नाम शामिल कराने के लिए कई बार आवेदन किया, सरकार आपके द्वार शिविर में भी भाग लिया, लेकिन आज तक न तो कोई सुनवाई हुई, और न ही कोई अधिकारी स्थिति देखने आया।

“मैं प्रखंड कार्यालय जाता हूं, लेकिन समझ नहीं आता कि कहां जाऊं, किससे मिलूं। थक-हार कर लौट आता हूं,” — यह कहते हुए जितेंद्र भावुक हो उठते हैं।

उन्होंने मीडिया के माध्यम से प्रखंड विकास पदाधिकारी से गुहार लगाई है कि “कृपया मेरी झोपड़ी की जगह एक छत दिलवा दीजिए।”

स्थिति इतनी दयनीय है कि बारिश में झोपड़ी टपकती है, पीने का पानी तक नहीं है, और घर में कुत्ते-बिल्ली घुसकर खाना झूठा कर देते हैं। जबकि आज के दौर में लोग घरों में फ्रिज और साफ पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं, जितेंद्र परिवार के साथ कुएं का पानी पीने को विवश हैं।

जितेंद्र साह की यह स्थिति न केवल योजनाओं की पोल खोलती है, बल्कि एक गरीब की असहायता और सिस्टम की संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल भी खड़ा करती है।

अब देखना है कि प्रशासन इस बार उसकी आवाज़ तक पहुंचता है या यह गुहार भी बाकी आवेदनों की तरह फाइलों में गुम हो जाएगी।


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  • Rajeev Ranjan Singh

    Location: Kandi Rajeev Ranjan Singh is reporter at Aapki Khabar from Kandi, Garhwa

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