अमित शाह के निर्देश पर रघुवर दास से मिले बाबूलाल मरांडी इस मुलाकात के हैं कई मायने

रांची : झारखंड भाजपा के दो बड़े नेताओं प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी और पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास की मुलाकात से भाजपा की राजनीति में हलचल है।  इस मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे हैं। सचमुच यह मुलाकात भाजपा की राजनीति के लिए अहम है, क्योंकि यह सामान्य मुलाकात नहीं है। इसके कई मायने और संकेत हैं।
   दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के दूसरे दिन है बाबूलाल मरांडी ने रघुवर दास से मुलाकात की है। वह भी झामुमो के गढ़ दुमका में। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में शामिल होने के लिए रघुवर दास दुमका गए थे। बाबूलाल मरांडी रांची से सीधे दुमका पहुंचे और वहीं पर रघुवर दास से मुलाकात और बात की।
   यह माना जा रहा है कि अमित शाह के निर्देश और सलाह पर ही बाबूलाल ने रघुवर दास से मुलाकात की है। रघुवर दास के फिर से सक्रिय राजनीति में लौटने के बाद संभवत इस तरह अकेले में दोनों नेताओं ने पहली बार बातचीत की है।  बातचीत की तस्वीर भी एक खास उद्देश्य के तहत ही जारी की गई है।
   धबीजेपी में प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होना है।  इसलिए इस मुलाकात को महत्वपूर्ण माना जा रहा क्योंकि रघुवर दास भी अध्यक्ष पद के प्रबल दावेदार हैं।  रघुवर दास पिछले कुछ दिनों से काफी सक्रिय हो गए हैं। वह लगातार जिलों का दौरा कर रहे हैं और कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि अध्यक्ष की रेस में आगे हैं। रघुवर दास कह चुके हैं कि वह झारखंड की राजनीति में ही सक्रिय रहना चाहते हैं।  में प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होना है।  इसलिए इस मुलाकात को महत्वपूर्ण माना जा रहा क्योंकि रघुवर दास भी अध्यक्ष पद के प्रबल दावेदार हैं।  रघुवर दास पिछले कुछ दिनों से काफी सक्रिय हो गए हैं। वह लगातार जिलों का दौरा कर रहे हैं और कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि अध्यक्ष की रेस में आगे हैं। रघुवर दास कह चुके हैं कि वह झारखंड की राजनीति में ही सक्रिय रहना चाहते हैं।
    बाबूलाल मरांडी और रघुवर दास पार्टी के दो बड़े नेता और चेहरे हैं । यदि दोनों साथ मिलकर चलेंगे तो निश्चित रूप से झारखंड में संगठन को मजबूती मिलेगी। विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से भाजपा लगभग हाशिये पर है। संगठन कमजोर है और कार्यकर्ताओं में निराशा है।
झारखंड बीजेपी में अर्जुन मुंडा व चंपई सोरेन जैसे कद्दावर नेता भी हैं। यदि सभी नेता एक साथ मिलकर राज्य में काम करें तो झारखंड मुक्ति मोर्चा और इंडिया गठबंधन को चुनौती दे सकते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि भाजपा अपनों से हार जाती है। पार्टी में जबरदस्त गुटबाजी है। परजीवी और जनविहीन नेताओं का बोलबाला है। ऐसे नेताओं को किनारे लगाकर केंद्रीय नेतृत्व नए और जनआधार वाले नेताओं को आगे करती है तो पार्टी को इसका लाभ मिलेगा।
   फिलहाल तो पार्टी किसको प्रदेश अध्यक्ष बनती है यही देखना है। इसी से यह साबित होगा कि पार्टी आगे किस दिशा में जाना चाहती है और हेमंत सरकार को कितनी चुनौती दे पाती है। अध्यक्ष के चयन से ही झारखंड में भाजपा की दिशा और दशा तय होगी।

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  • Sunil Singh

    Sunil Singh is Reporter at Aapki khabar from Ranchi, Jharkhand.

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