रांची : मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बार-बार कह रहे हैं कि वह छात्रों की मांगों पर विचार कर रहे हैं. सरकार संवेदनशील है. आंख, कान, नाक सब कुछ सही सलामत है. वह समावेशी समाधान चाहते हैं. व्यापक विचार विमर्श चाहते हैं. सभी 24 जिलों के छात्र-छात्राओं से बातचीत करेंगे. उनकी राय जानेंगे. राय जानने के बाद सरकार फैसला लेगी. हेमंत बाबू छात्रों /अभ्यार्थियों की राय और मांग तो सार्वजनिक है. आपकी सरकार तक पहुंच चुकी है. रांची में जो आंदोलन चल रहा है इसमें सभी जिलों के छात्र, छात्राएं, युवा,अभ्यर्थी शामिल हैं. जो राय सार्वजनिक है, फिर अलग से युवा क्या राय देंगे. मेरी समझ से यह आंदोलन को लंबा खींचने का बयान है. छात्रों की मांग को लटकाने- भटकाने जैसा है. मांग यही है न कि जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षा और रिजल्ट में धांधली हुई है. नौकरी पैसे से बेची गई है. सरकार तक सबूत पहुंच चुका है. छात्र परीक्षा रद्द करने, सीबीआई जांच कराने, फिर से परीक्षा लेने और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और सुधार की मांग कर रहे हैं. मुख्य मांग तो यही है तो फिर अलग से राय क्या होगी. सरकार संवेदनशील है तो फिर मांग पूरी क्यों नहीं हो रही है. एक पखवाड़े से छात्र भारी बरसात में प्लास्टिक के टेंट के नीचे हैं. कई छात्र भूख हड़ताल की वजह से बीमार पड़ चुके हैं, तो अब आपको कितना वक्त चाहिए. गड़बड़ी नहीं हुई है तो जेपीएससी अध्यक्ष ने इस्तीफा क्यों दिया. अब तक 17-18 लोग गिरफ्तार कैसे हुए. सरकार को बताना चाहिए. अब तक छात्रों के अलग-अलग गुट की चर्चा नहीं हुई. सबकी मांग और उद्देश्य एक है. लेकिन सरकार का खेल देखिए. आंदोलन में फूट डालने के उद्देश्य से सरकार अलग-अलग गुट से बातचीत कर रही है. आखिर ऐसा क्यों. इससे जाहिर है कि सरकार की मंशा ठीक नहीं है. सरकार फूट डालकर आंदोलन को कमजोर करना चाहती है. इस साजिश को समझने की जरूरत है.











