कानून से ऊपर कौन? दिव्य कमल हॉस्पिटल विवाद में आमने-सामने नेता, अग्निपरीक्षा में प्रशासन

Location: Garhwa


गढ़वा जिला मुख्यालय के कचहरी रोड में स्थित दिव्य कमल हॉस्पिटल को लेकर उठा विवाद अब केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह कानून, राजनीति और प्रशासनिक निष्पक्षता की कसौटी बनता जा रहा है। अस्पताल को सील किए जाने के बाद पूर्व मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर द्वारा समर्थकों के साथ पहुंचकर ताला खुलवाने की घटना ने पूरे मामले को गंभीर राजनीतिक रंग दे दिया है।
मामले की शुरुआत तब हुई जब सदर एसडीओ संजय कुमार और सिविल सर्जन द्वारा कथित अनियमितताओं तथा आवश्यक दस्तावेजों की कमी के आधार पर दिव्य कमल हॉस्पिटल को सील करने का आदेश दिया गया। प्रशासन की ओर से अस्पताल परिसर में ताला लगा दिया गया था। लेकिन गुरुवार को पूर्व मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर अपने समर्थकों के साथ अस्पताल पहुंचे और ताला खुलवाकर अस्पताल को पुनः चालू करवा दिया। इस दौरान उन्होंने एसडीओ पर अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई करने का आरोप भी लगाया।
इस घटना के बाद राजनीतिक तापमान तेज हो गया है। स्थानीय विधायक और भाजपा नेता सत्येंद्र नाथ तिवारी ने इस पूरे प्रकरण को कानून के साथ खिलवाड़ करार दिया है। शुक्रवार को आयोजित प्रेस वार्ता में उन्होंने प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि सील किए गए अस्पताल का ताला खुलवाना सीधे-सीधे सरकारी कार्य में बाधा उत्पन्न करने जैसा है। उन्होंने उपायुक्त से मांग की है कि पूर्व मंत्री पर तत्काल मामला दर्ज किया जाए। विधायक ने यह भी कहा कि कोई भी जनप्रतिनिधि कानून से ऊपर नहीं है और प्रशासन को निष्पक्षता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए।
दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े सवाल को जन्म देता है—क्या कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, कानून को अपने हाथ में ले सकता है? यदि प्रशासन द्वारा किसी संस्थान को नियमों के उल्लंघन के आधार पर सील किया गया है, तो उसका समाधान कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए, न कि शक्ति प्रदर्शन या राजनीतिक दबाव के जरिए।
इस विवाद ने एक बार फिर जिले की राजनीति में पूर्व मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर और भाजपा विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी को आमने-सामने ला खड़ा किया है। दोनों नेताओं के बीच पहले भी कई मुद्दों पर तीखी राजनीतिक टकराहट देखने को मिल चुकी है और अब यह मामला उस टकराव को एक नया आयाम देता दिखाई दे रहा है।
सबसे अहम सवाल प्रशासन की भूमिका को लेकर भी उठ रहा है। यह घटना प्रशासन के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। यदि प्रशासन वास्तव में नियमों के तहत अस्पताल को सील करने की कार्रवाई करता है, तो फिर उसके आदेश की अवहेलना करने वालों पर कार्रवाई भी उतनी ही सख्ती से होनी चाहिए। लेकिन यदि राजनीतिक दबाव के कारण प्रशासन मौन रहता है, तो इससे कानून के राज पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े होंगे।
झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रभावशाली नेता और पूर्व मंत्री होने के कारण मिथिलेश कुमार ठाकुर पर कार्रवाई करने का साहस प्रशासन दिखाता है या नहीं—यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। फिलहाल, पूरा मामला इस बात की परीक्षा बन चुका है कि कानून का शासन वास्तव में लागू होता है या फिर राजनीतिक प्रभाव के आगे प्रशासनिक व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है।
गढ़वा की जनता भी अब इस पूरे घटनाक्रम पर प्रशासन की अगली कार्रवाई का इंतजार कर रही है, क्योंकि यह केवल एक अस्पताल का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह कानून के सम्मान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बन चुका है।

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  • Vivekanand Upadhyay

    Location: Garhwa Vivekanand Updhyay is the Chief editor in AapKiKhabar news channel operating from Garhwa.

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