Location: Garhwa
गढ़वा: पावस ऋतु में गाए जाने वाले गीतों में कजरी का विशेष स्थान है। साहित्यकार डॉ. नथुनी पांडेय आजाद के अनुसार, सावन के काले-कजरारे बादलों को देखकर ही इस गीत-विशेष को ‘कजरी’ नाम मिला। काजल शब्द से निकले कज्जल के अपभ्रंश से ‘कजरी’ बना। बादलों की श्यामिमा (कजरापन) ही इसके नामकरण का प्रमुख कारण रहा।
पांडेय ने बताया कि महाकवि कालिदास ने भी संकेत किया था कि मेघों के आगमन से प्रकृति में अद्भुत मादकता छा जाती है। सावन की इसी पृष्ठभूमि में कजरी गीत गाए जाते हैं, जिनमें कोमलता और श्रृंगार भाव का अद्भुत संगम होता है।
उन्होंने कहा—“बरसे जोर-जोर से पानी,
चुवे टूटही मोर पलानी,
पिया गइलें विदेशवा, लागत जहर कजरिया बा।”
महाकवि सूरदास ने भी अपनी रचनाओं में इस सौंदर्य का वर्णन करते हुए लिखा—“जहां देखो तहं स्याममयी है,
स्यामकुंज वन यमुना स्यापा,
स्याम स्याम घन छटा छई है।”
डॉ. पांडेय ने बताया कि भोजपुरी, बनारसी, पटनहिया और मिर्जापुरी कजरी अपनी शैली और स्थानीयता के आधार पर अलग-अलग रूपों में प्रसिद्ध है। “मिर्जापुर को कजरी का मायका माना जाता है, जबकि पलामूवासी डाल्टनगंज से सटे कजरी गांव को इसका पीहर मानते हैं।
कजरी गीतों के पीछे विरह, प्रेम और प्रकृति के सम्मिलन की भावनाएं हैं, जो सावन के मौसम में लोकसंस्कृति को जीवंत कर देती हैं।














