दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन से भारतीय राजनीति को मिला एक दुर्लभ संदेश

Location: Garhwa


झारखंड आंदोलन के प्रणेता, झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन का निधन न केवल एक युग का अंत है, बल्कि भारतीय राजनीति को गहराई से झकझोरने वाला क्षण भी है। उनके जीवन और संघर्ष की विरासत अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन जिस तरह से उनकी अंत्येष्टि के समय विभिन्न राजनीतिक दलों के दिग्गज नेताओं ने एक साथ खड़े होकर श्रद्धांजलि दी, वह भारतीय राजनीति में एक सकारात्मक और दुर्लभ दृश्य था — राजनीतिक सद्भाव और परस्पर सम्मान का संदेश।

गुरुजी का जीवन आदिवासी अस्मिता, अधिकार और स्वाभिमान की लड़ाई में बीता। उन्होंने संसद में तो अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई ही, लेकिन उससे कहीं अधिक उनका प्रभाव जनता के बीच, विशेषकर झारखंड के जन-जन के दिल में रहा। उनके निधन के बाद जिस तरह का राष्ट्रीय शोक और व्यापक सम्मान दिखा, उसने साबित कर दिया कि वे किसी एक दल के नेता नहीं थे, बल्कि जननेता थे — जनहित के पक्षधर और अन्याय के विरोधी।

उनकी अंत्येष्टि में जो दृश्य सामने आया, वह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और व्यापकता का प्रतीक बना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि शिबू सोरेन का योगदान अमूल्य है। वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने भी उनकी राजनीतिक भूमिका और जनसंघर्षों को याद करते हुए उन्हें ‘मूल्य आधारित राजनीति का प्रतीक’ बताया।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, जो उनके पुत्र हैं, ने पिता के अंतिम संस्कार के दौरान जनसमूह और नेताओं की उपस्थिति को ‘जनसमर्थन का प्रतीकात्मक सम्मान’ बताया। वहीं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा, जिन्होंने झारखंड भाजपा की राजनीति में अहंम भूमिका निभाई है, उन्होंने भी अंत्येष्टि में शामिल होकर यह दिखा दिया कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद पारस्परिक सम्मान जीवित है।

इसके अतिरिक्त वामपंथी दलों से लेकर क्षेत्रीय दलों तक के नेता — चाहे वे भाजपा नेता व पुर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी हों या,आजसू सुप्रीमों सुदेश महतो तथा झारखंड में सक्रिय कांग्रेस के नेता— सभी ने अपने-अपने तरीके से गुरुजी के प्रति श्रद्धा अर्पित की। यह अपने आप में दुर्लभ दृश्य था कि राजनीतिक वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद सभी नेता एक मंच पर शोक व्यक्त करने के लिए उपस्थित थे।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि भारतीय राजनीति में अभी भी संवेदनशीलता, परस्पर सम्मान और मूल्यों की गुंजाइश बची हुई है। जहाँ आम दिनों में एक-दूसरे पर तीखी टिप्पणियाँ होती हैं, वहीं किसी महान नेता की विदाई के क्षण में जब सत्तापक्ष और विपक्ष साथ खड़े हों, तो यह राजनीतिक परिपक्वता की मिसाल बन जाती है।

शिबू सोरेन के निधन से जो राजनीतिक खालीपन पैदा हुआ है, उसकी भरपाई शायद संभव नहीं। लेकिन उनके अंतिम संस्कार के अवसर पर देशभर से आए नेताओं की एकजुटता ने हमें यह आश्वस्त किया है कि राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं होने चाहिए।

गुरुजी के जीवन से तो हम पहले ही बहुत कुछ सीखते आए हैं, लेकिन उनकी मृत्यु ने भी हमें एक पाठ सिखाया — राजनीति, जब इंसानियत के धरातल पर उतरती है, तो वह समाज को जोड़ती है, तोड़ती नहीं।

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  • Vivekanand Upadhyay

    Location: Garhwa Vivekanand Updhyay is the Chief editor in AapKiKhabar news channel operating from Garhwa.

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