रांची: झारखंड में अबुआ सरकार है. आखिर इस अबुआ सरकार को कौन चला रहा है. मुख्यमंत्री- मंत्री या अधिकारी. यह बड़ा सवाल है. सरकार की कार्यप्रणाली और सोच पर फिर एक बार सवाल खड़ा हुआ है. मंगलवार को हुई कैबिनेट की बैठक में सरकार ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) नियमावली को मंजूरी दे दी. भारी विरोध के बावजूद भोजपुरी, मगही और अंगिका को क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल नहीं किया गया. कहा गया कि इसके लिए कमेटी बनेगी. कमेटी जब अनुशंसा करेगी तब इन भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा में शामिल किया जाएगा.
पिछली कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव को लाया गया था, लेकिन वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर और दीपिका पांडे आदि के विरोध के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था. कहा गया था कि इस पर विचार किया जाएगा तब निर्णय लिया जाएगा. अब बिना कोई निर्णय लिए पहले से तैयार प्रस्ताव को ही मंजूरी दे दी गई. कल किसी ने विरोध नहीं किया. वित्त मंत्री बीमार हैं. बैठक में नहीं थे. लेकिन उन्होंने तो पहले ही विरोध जता दिया था. सरकार को समझाया था. कल बैठक में नहीं थे तो क्या हुआ. दीपिका पांडे थी. पर विरोध की सूचना नहीं है. न कोई प्रतिक्रिया सामने आई है.
भोजपुरी और मगही पलामू के कई इलाकों में बोली जाती है जबकि संथाल परगना के कई इलाकों में अंगिका बोली जाती है. इन भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा के रूप में शामिल करने को लेकर लंबे समय से आंदोलन चल रहा है. लेकिन सरकार सुनने को तैयार नहीं है. मनमानी कर रही है. अधिकारी सरकार को मिस गाइड कर रहे हैं और सरकार उनकी ही सुन रही है.
इसीलिए यह सवाल उठता है कि यह अबुआ सरकार है या बबूआ. जिसको कुछ पता नहीं है. पलामू प्रमंडल और संथाल परगना से आने वाले विधायक और मंत्रियों को यह पता नहीं है कि उनके इलाके में क्या भाषा बोली जाती है. यदि पता है तो फिर वह चुप क्यों हो जाते हैं. विरोध क्यों नहीं करते. यह सवाल तो जनता पूछेगी.
10 वर्षों से जेटेट की परीक्षा नहीं हुई है. अब परीक्षा होगी तो क्षेत्रीय भाषा के रूप में मगही, भोजपुरी और अंगिका शामिल नहीं होगी. यह ऐसी सरकार है जो विरोध की आवाज सुनती नहीं है. युवा आंदोलन कर रहे और सरकार अपने एजेंडे पर आगे बढ़ रही है. जन भावना से मतलब नहीं है. वाह रे सरकार और हमारे माननीय.











