ताक – झांक

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फिर आ गई सरकार आपके द्वारा

अब सारी समस्या छूमंतर हो जाएगा क्योंकि तीसरी बार सरकार आपके द्वारा पहुंच रही है. पूर्व के दो बार के सरकार आपके द्वारा का अनुभव भुला दीजिए और नेताजी लोगों के लिए भीड़ का हिस्सा बन जाइए. इस बार नहीं चुकाना है. पिछले दो बार की जो समस्या थी उसे तीसरी बार लेकर सरकार आपके द्वारा में हाजिर हो जाए कौन जानता है. शायद इस बार आपकी आवास पेयजल सड़क शिक्षा और जमीन से संबंधित पेंडिंग कार्य पूर्ण हो जाए

हमहूं लड़ेंगे चुनाव

एक राजनीतिक पार्टी की ओर से चुनाव लड़ने की दावेदारी पेश करनी थी. लग रहा था हाशिए पर खडी राजनीतिक पार्टी के लिए कौन टिकट मांगेगा. पर ऐसा नहीं एक दर्जन लोगों ने दावेदारी पेश कर दी है.दावेदारों में अधिकांश ऐसे भी हैं जो चुनाव लड़ने के लिए आवेदन नहीं भरे हैं,बल्कि पार्टी में अपनी पोजिशनिंग के लिए. क्योंकि दावेदारी पेश करने से पार्टी के अंदर पोजीशन सुधर जाता है.ऐसा नहीं तो फिर पिछले 5 साल में कैसे इतनी पार्टी ताकतवर हो गई की जिस पार्टी में 2019 के चुनाव में कोई टिकट लेने के लिए तैयार नहीं था. इस बार एक दर्जन दावेदारी पेश कर दिया जाए

रिवर फ्रंट तो नहीं बना, पूल भी हाथ से गया

भले ही शहर की लाइफ लाइन दानरो नदी आवागमन के लिहाज से भी खास महत्व रखता हो. परंतु इस नदी पर रिवर फ्रंट की सपना देख रहे गढ़वा जिले के लोगों को अब इस जर्जर पुलिया भी साथ देने को तैयार नहीं है. इस पुलिया पर हैवी वाहन पर टूटने की खतरा को देखते हुए पाबंदी लगा दी गई है.ऐसे में गढ़वा जिले से जुड़े लाखों आबादी पुलिया से होकर प्रतिदिन गुजरती है उसके सामने तो बड़ा संकट उत्पन्न होने ही वाला है..अंतरप्रांतीय छत्तीसगढ़ बिहार एवं उत्तर प्रदेश के भारी वाहनों के साथ-साथ यात्री वाहनों के आवागमन पर भी प्रभाव पड़ेगा.

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ताक–झांक

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मैं भी हूं दावेदार

चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आते जा रही है, नेताओं कार्यकर्ताओं की चुनाव लड़ने की महत्वकांक्षा वैसे-वैसे कुलाचे मारने लगी है अब तो टिकट पाने की प्रतिस्पर्धा में शामिल अपने ही पार्टी की साथी में खोंट गिनाते हुए मैं भी हूं दावेदार ऐसा कहते एक एक विधानसभा में दर्जनों नेताजी लोग सुनाई देने लगे हैं. एक नेताजी ने तो अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों के लिए खुद को सर्वाधिक सर्व सुलभ होने के आधार पर टिकट का गंभीर प्रत्याशी बताते हुए यहां तक दावा ठोक दिया है कि पार्टी की ओर से सर्वे चल रहा है.उस सर्वे में कुल पांच नाम है. जिसमें मेरा भी है अपने दावे का आधार उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं की ओर से किए जा रहे फोन कॉल को बताया.

बाबा का वारिस पोता

राष्ट्रीय पार्टी के के एक बड़े नेता जी का राजनीतिक रसूख क्या घट गयी. उनके ही वंशजों में उनकी ही पार्टी और जनाधार पर कब्बजा जमाने की होड सी मच गई है. जिसमें बाबा का वारिस एक पोता तो खुद को असली वारिस जताकार बाबा को उनकी पार्टी से हैं बेदखल करने की मूड में दिख रहा है.जबकी दूसरे की कोशिश बाबा से मिलता जुलता इतिहास जताकर अपने बैकग्राउंड के आधार पर बाबा का वारिस होकर जनाधार पर कब्जा जमाने की कोशिश में हैं.ऐसे में बाबा की आने वाला विधानसभा चुनाव में असली शक्ति परीक्षा होनी है. जिसमें पता चल जाएगा की बाबा का औकात बचा है. अथवा बाबा को राजनीतिक रूप से दरकिनार करने में जुटे पोता की विजय होती है.

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ताक– झांक

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डंडा पढ़ते हैं भाजपाई रेस

रांची के जनाक्रोश रैली में हेमंत सोरेन की सरकार ने लाठी नहीं चलवाई, बल्की भाजपाई नेता एवं कार्यकर्ता पर फूल बरसाकर जोश भर दिया है. वरना डंडे की चोट खाकर भाजपाई घर में बैठने के बजाय ऐसे रेस नहीं होते. क्योंकि अपनी ही सरकार जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से आहत होकर बर्षों से बैठे भाजपा कार्यकर्ता इस कदर सड़क पर आकर हेमंत सरकार के खिलाफ गला फाड़ फाड़ कर नारेबाजी करते पुतला नहीं जलाते. लोकसभा चुनाव में ही सार्वजनिक रूप से भाजपा कार्यकर्ताओं की गुस्सा अपने ही पार्टी नेताओं के खिलाफ खुलकर सामने आया था. ऐसे में पुलिस ने रांची में लाठी नहीं फूल बरसाए हैं जैसी स्थिति ही भाजपा के संदर्भ में दिखलाई पड़ रही है

ऐसी विकास से तौबा

नेताजी विकास का चाहे जितना ढिंढोरा पीट ले पर शीशे में बंद लग्जरी गाड़ी से बाहर निकल कर गढ़वा शहर को झांक ले तो यहां के नागरिकों की जीवन शैली से समझ में आ जाएगा. कि लोग कितने परेशान हैं. सड़क की सभी गलियों में भले ही नियमित नल से जल नहीं मिल रहा है, पर शहर की गलियों की सड़कों पर पाइप बिछाने के नाम पर जो खुदाई हुई, उससे शहर की सूरत तो बिगाड़ ही गई है राह चलते लोगों के लिए भी भारी पड़ रहा है. बिजली का रोना तो निरंतर जारी ही है. नदियों से घिरे शहर में नगर परिषद के कचरे के देर से फैल रही दुर्गंध भी जीना मुहाल कर रखा है. क्या-क्या गिनवाए बिजली, पानी सड़कजाम तथा जल जमाव सारा संकट तो शहर के लोगों को ही झेलनी पड़ रही है.

फ्री बालू के नाम पर भी लूट जारी

सुना है बालू फ्री हो गया है.चलान कटवाईये और घर मकान बनाने के लिए मंगा लीजिए. पर हकीकत यह है कि फ्री बालू से पहले रात में लूट होती थी अब दिन के उजाले में बालू माफिया लोगों को लूट रहे हैं. गढ़वा शहर के लोगों को अभी भी बालू 4500 रुपए में ट्रैक्टर वाले उपलब्ध करा रहे हैं. ऐसे में फ्री बालू महज प्रचार नहीं तो और क्या है. प्रशासन का बालू माफिया को फ्री बालू के नाम पर लूट का छूट दिया जाना समझ से परे है. नेताजी लोग भी फ्री बालू से पहले गला फाड़ फाड़ कर सरकार को कोश रहे थे पर उनकी जुबान भी बंद है.

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ताक–झांक

Location: Garhwa

आघी को बिजली आधा अंधेरे में

गढ़वा का विकास से सभी गदगद हैं. गदगद रहे भी क्यों ना, जिला मुख्यालय गढ़वा शहर में विकास की गंगा बह रही है. बस फर्क इतना है कि आधी आबादी को बिजली मिल रही है आधी आबादी उमश भरी इस गर्मी में ढिबरी युग में जीने को विवस हैं. पूरे को नहीं आधी आबादी को ही सही, पर नेताजी के दावे के अनुसार 18 से 20 घंटे बिजली तो मिल ही रही है. इसे शहर का विकास नहीं कहे तो और क्या कहें?

एंबुलेंस में मरीज का दम घुटे क्या फर्क पड़ता है?

गढवा शहर के लोग इन दिनों दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों की सड़क जाम का नजारा घर बैठे देख देख रहे हैं. शहर के सौन्दर्यीकरण का बोध कराता रंका मोड़ के इलाके से लेकर टंडवा तक गुजरना हो तो घंटा दो घंटे का अतिरिक्त समय निकालकर चलें.वरना कहीं भी फंस सकते हैं, और तो और सड़क जाम के कारण इस इलाके में एंबुलेंस में मरीज भी घंटों कराहते सुनाई देते हैं.जहां तक रही ट्रैफिक पुलिस की बात तो पूरी ट्रैफिक पुलिस की तत्परता बेचारे वैसे सहायक पुलिस के जवानों के हाथों रहता है जिनका कोई नहीं सुनता. लगता है पुलिस विभाग भी सड़क पर पसीना बहाने के लायक सहायक पुलिस को ही समझ रही है.


राजा नहीं तो रानी ही सही

गढ़वा जिले के एक विधानसभा चुनाव मैदान में राजा और रानी को लेकर दिलचस्प चर्चा चल रही है. चर्चा के अनुसार राजा साहब को बेहतर सिम्बल से मौका नहीं मिला तो भले ही रानी को चुनाव मैदान में उतारना पड़े, पर इस बार मैदान मार ही लेना है. राजा और रानी की इस पहेली के पीछे पारिवारिक खींचतान है, या रणनीति का हिस्सा, फिलहाल कहना मुश्किल है. समय आने पर ही इसका खुलासा होगा.

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  • तक–झांक

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    अपनों से घिरते जा रहे हैं नेताजी

    जैसे-जैसे चुनाव का समय नजदीक आते जा रहा है नेताजी की मुश्किल बढ़ते जा रही है. जिला संगठन के विस्मेंतार में नेताजी की चलती तो देखी गई,पर संगठन की घोषणा होते हैं पार्टी के अंदर के ही उनके विरोधी नेताजी के खिलाफ गोलबंद हो गए हैं.गोलबंदी ऐसी वैसी नहीं, गोलबंद होकर सबक सिखाने के मूड में अभी से दिखने लगे हैं. लगता है नेताजी को इस बार भी पिछले चुनाव की ही तरह पार्टी का अंतर कलह का शिकार होकर पछताना न पड़ जाए.

    अपने मुंह मियां मिट्ठू

    नेताजी आत्ममुग्धा का शिकार हो गए हैं. खुद में विकास पुरुष की छवि देखकर इतरा रहे हैं. ऊपर से संसाधन के बल पर सबको मांत दे देंगे ही इस लेकर पुरी तरह से अश्वस्त है. विकास का घमंड नेताजी पर सिर चढ़कर बोल रहा है नेताजी को ऐसा लग रहा है मानो उनके विकास से सब गदगद है जातीय महापुरुषों की प्रतिमा लगाने से सारे महापुरुषों को मानने वाली जातियों के मतों पर कब्जा हो चुका है. इस घमंड में नेताजी पैर सातवें आसमान पर है .

    छोटे मियां तो छोटे मियां बड़े मियां सुभान अल्ला

    जैसे-जैसे चुनाव की समय नजदीक आते जा रहा है नेतागिरी का भूत नेताओं पर इस कदर चढते जा रहा है कि वे अपना कारोबार छोड़कर अभी से चुनाव मैदान में कूद पडे हैं, ऐसे ही एक नेताजी इन दोनों बड़े-बड़े नेताओं को चुनौती देने की बात कर रहे हैं. नेताजी एक तरफ अपने कौम को अपना जागीर समझ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ गढ़वा का विकास उनकी ही पार्टी कर सकती है ऐसा ढोल भी खुब पीट रहे है. पर शायद नेताजी भूल गये हैं की पिछली चुनाव में उनका कौम उनके तरफ मुड़कर भी नहीं देखा था. परिणाम था कि नेताजी की जमानत नहीं बचा पाए थे.

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    धार्मिक आयोजन के पेटेंट पार्टी से आगे बढ़ गए नेताजी

    वोट की राजनीति में धर्म की चासनी गढ़वा में खूब चढी है. धार्मिक आयोजनों की प्रतिस्पर्धा में कौन आगे बढ़ेगा इसका रेस देखने को मिल रहा है. हिन्दु का हो अथवा में मुस्लिम का, सभी में आयोजकों के पास तक चंदा की राशि पहुंचाने से लेकर कार्यक्रम में शामिल होकर सर्वधर्म समभाव को नेताजी लोग तो दर्शा ही रहे हैं,पर इसमें सबसे भारी चिंता हिंदू धर्म के पेटेंट पार्टी को हो गई है, क्योंकि सर्व धर्म के हितैषी पार्टी के नेताजी हिंदु देवी देवताओं से जुड़े आयोजनों को लेकर इतने एक्सपोज हो रहे हैं कि पेटेंट पार्टी के नेताजी को खतरा नजर आने लगी है. लिहाजा ऐसे आयोजनों पर नेताजी के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाते चल रहे हैं

    नेताजी लोगों की 1,2,3 की नंबरिंग

    भले ही चुनाव में विलंब है, पर नेताजी लोगों की बढी गतिविधि से चुनावी मौसम का आगाज हो चुका है. चौक चौराहे,चौपाल पर अभी से चुनाव का रिजल्ट भी निकाला जाने लगा है. चुनाव मैदान में नेताजी लोगों की पोजिशनिंग की नंबरिंग एक नंबर से तीन नंबर तक की चल रही है. एक नंबर पर कौन सबसे बड़ा सवाल बहसबाजी के केंद्र में है.तर्क है कि हाई-फाई नेताजी का पोजीशन चाहे एक में या सीधे तीसरे पयदान पर निश्चित है.लंबे समय से राजनीतिक दृष्टिकोण से हाशिए पर गए नेताजी की पोजिशनिंग पर भी भारी सस्पेंस है. उनके लिए भी दूसरे स्थान की गुंजाइश नहीं बन रही है वह भी1,3 के गिनती में है. रही बात तीसरे की तो इनका स्थान एक नंबर नहीं तो दो नंबर तीसरे स्थान पर जाने की गुंजाइश नहीं बतया जा रहा है. साथ ही सभी मान रहे हैं की लड़ाई मैं चाहे दूसरा पक्ष जो हो पर एक पक्ष तो कमल फूल वाले नेताजी ही रहेंगे.

    भवनाथपुर में नेताओं की दोस्ती चर्चा में

    भवनाथपुर विधानसभा चुनाव क्षेत्र की राजनीति में दो नेताओं की दोस्ती चर्चा में है. चर्चा की केंद्र में चुनावी समीक्षा है. दोस्ती से चुनावी राजनीति पर क्या असर होगा इसका आकलन चौक चौराहे चौपाल में खुब चल रही है. चर्चा रोचक है तर्क दिया जा रहा है कि चुनाव आते तक दोस्ती बरकरार रहेगी कोई जरूरी नहीं. दोस्ती पर संदेह जताने वालों के अनुसार वक्त के साथ नेताजी दोस्त को दगा देकर कहीं चुनाव मैदान में ना कूद पड़े, मुश्किल इस बात कीभी है कि चुनावी राजनीति में दोस्ती रह भी गई तो क्या होगा इसकी भविष्यवाणी भी चर्चा में है.लिहाजा दोस्ती जाने पर ही नही बल्कि बरकरार रहने पर फायदे नुकसान का भी खूब अटकल बाजी लगाई जा रही है. मसलन दोस्त को जितना फायदा मिलेगा कहीं उनके अतीत की छाया से नुकसान ज्यादा न पहुंच जाए. जैसे तर्क भी गधे जा रहे हैं.

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  • ताक– झांक

    Location: Garhwa

    विकास या पावर प्रजेंटेशन शो

    उपासना का दिखावा शास्त्र में भले वर्जित हो,पर नेताजी को इससे क्या लेना देना, कोई गुप्त दान थोड़े ना किया है.धार्मिक स्थलों का विकास में लगी पूंजी का जब तक बेहतर प्रेजेंटेशन नहीं हो, तब तक रिटर्न कैसे मिलेगा. कुछ ऐसी ही दौर से कल गढ़वा शहर के लोगों की नेताजी के विकास के पावर प्रजेंटेशन शो के दौरान गुजरनी पडी. आयोजन को भव्य बनाने के लिए नेताजी ने पावर का खूब इस्तेमाल किया 24 घंटे पहले से ही मुख्य सड़क की कनेक्शन गली बंदकर गई थी.आने जाने वाले परेशान रहे, उद्घाटन का दिन आया तो मुख्य सड़क को भी पूरी तरह से बंद कर दिया गया. नेताजी के उद्घाटन समारोह के दौरान घंटों शहर की तमाम गतिविधी पावर के गिरफ्त में कैद रही,नेताजी के विकास के इस पावर प्रजेंटेशन से गढ़वा शहर के लोग अभीभूत है.

    चुनाव की जल्दबाजी थी, यह क्या हुआ?

    सत्ता की मलाई के लिए रात दिन एक कर जल्दबाजी में चुनाव होने की संभावना की मद्देनजर चुनाव की तैयारी में सदाव्रत लूटा रहे नेताजी, चुनाव आयोग के द्वारा चुनाव की तिथि टाल कर निराश किया. क्योंकि सत्ता की मलाई की चाहत की जल्दबाजी में भी ब्रेक लग गई, ऊपर से 2 माह का चुनाव की तैयारी का अतिरिक्त खर्च भी बढ गया.अब आगे बढ़ चुके हैं तो पीछे मुड़कर देख भी नहीं सकते. कार्यकर्ताओं और समर्थकों से सुख दुख में शामिल होने की कसमें जो खाये हैं.उसे अभी कैसे भूल जांए भूलने के लिए कम से कम चुनाव संपन्न होने तक का इंतजार तो करना ही होगा, भूल गए तो नाराजगी का भय है, ऐसे में नेताजी चुनाव का डेट बढ़ने से निराशा है.

    बच्चों के मौत पर नेताओं का दिखावा दर्द

    नेताजी से बड़ा कोई कलाकार नहीं हो सकता. वैसे भी नेताओं के बारे में अब सब मानने लगे हैं कि रंग बदलने के मामले में नेताजी लोग गिरगिट से भी आगे बढ़ गए हैं. कल बभनी डैम में तीन बच्चों को डूबने से मौत के बाद नेताओं का छलका दर्द देखते ही बन रहा थी. डैम के पास लंबी चौड़ी सुरक्षा व्यवस्था करने की मांग करते नहीं अघा रहे थे , वहां उपस्थित पब्लिक भी सब समझ रही थी, चुनाव के नजदीक आने से नेताजी लोगों का दर्द को बेहतरी से महसूस कर रही थी क्योंकि बभनी डैम में डूब कर मरने की घटना बर्षों से जारी है. पर इस घटना से पहले इन नेताओं की सुरक्षा की चिंता नहीं थी,अब चुनाव नजदीक है इसलिए बच्चों की मौत पर अधिक से अधिक सियासी लाभ के लिए सुरक्षा का राग अलापने लगे हैं.

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    Location: Garhwa

    नेताजी धन्य हो गया गढ़वा

    कल 15 अगस्त को गढ़वा के लोग धन्य हो गए. क्योंकि मुख्यमंत्री जी के उद्घाटन के लंबे इंतजार के बाद फुटबॉल के मैदान का बंद दरवाजा जनसाधारण के लिए भले न खुला हो पर वीआईपी लोगों के लिए नुमाइसी हेतु फैंसी मैच के लिए खोल ही दिया गया. भला 7 करोड़ खर्च कर इसे सजाया गया है,तो इसकी सूरत ना बिगड़े इसका ख्याल तो रखना ही होगा. भले मॉर्निंग वॉक वाले पानी पी- पीकर कोसे.घर से निकल कर खेल का अभ्यास करने वाले खिलाडी जाएं तो जांए कहां इस तलाश में उदास हो,राह चलते लोग कुछ पल पडाव डालकर किसी के आने के इंतजार से वंचित रहे, पर नुमाइसी करने के लिए ही सही,जश्ने आजादी मनाने का मौका तो फैंसी फुटबॉल मैच खेलने के लिए वीआईपी लोगों को मिला ही, इससे बड़ा भला गढ़वा का और क्या हो सकता है विकास .

    कब तक खिदमत करनी होगी नेताजी

    जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रहा है नेताजी लोग बेचैन आत्मा की तरह घुडदौड लगाने में हलकान हैं. सभी अपने-अपने हिसाब से तुरुप का पता तलाश रहे हैं.कोई जनता को परिवर्तन का सपना दिखा रहा है, तो कोई पोल खोलकर मतदाताओं को आकर्षित करने के फेरे में है, पर अधिकारी भी जनसंवाद का फील्डिंग सजाने में परेशान है. ईश्वर से दुआ कर रहे हैं कि जल्दी चुनाव की घंटी बज जाती, और वे अपनी औकात फीलडिंग सजाने वालों को जाता देते, वेचारे अधिकारी ऐसा सोचे भी क्यों ना, नेताजी के लिए मंच का भी इंतजाम करना है, जायज नाजायज आदेश मानने का नौकरी बचाते हुए दबाव भी झेलनी पड रही है, उपर से जो सरकारी अफरगिरी की आदत पड़ी है,ड्यूटी आवर में भी मनमर्जी से ड्यूटी करो, अब कार्यकर्ता की तरह नेताजी का पिछलगू बने फिरो , भला कहां तक बर्दाश्त करे.

    चकमा दे रही है बिजली

    नेताजी का 18 से 20 घंटे बिजली सेवा निरंतर उपलब्ध कराने के दबाव के बावजूद बिजली रानी चकमा दे रही है. पिछले दिनों मरम्मती के नाम पर लोग बाग दिन -दिनभर पसीने बहाते रहे, सोचा था चलो बर्दाश्त करो अच्छे दिन आने वाले हैं,पसीने बहा कर भी खुश हो लो, पर सारा का सारा पसीना बहाना बेकार चला गया. बिजली रानी चकमा दे रही है.टीवी का स्विच ऑन कर इच्छा थी जश्ने आजादी का टीवी सेट पर ही सही पर दीदार कर लूं, पर बिजली रानी ने कसम खा रखी थी की 5-7 मिनट भी रेगुलर दर्शन नहीं दूंगी. लगता है सारा विभाग नेताजी का अंडर कंट्रोल है,पर बिजली विभाग में नहीं चलती.

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    माता-पिता से बढ़कर देवी देवता थोड़े ना है

    नेताजी के बढ़ते कदम को रोकने के लिए राजनीतिक विरोधी बेकार के हाय तौबा मचा रहे हैं. आरोप लगा रहे हैं की आध्यात्मिक मां के सामने अपने माता-पिता का नाम मोटे अक्षर में अंकित करवा दिया गया है. भला इसमें कहीं कोई संदेह है कि माता-पिता से बढ़कर देवी देवता थोड़े ना हैं. वैसे भी पुराने द्वार तोडकर नया द्वार लगाया गया है तो उसका लुक नया होना ही चाहिए

    खटारा बस में ठूस ठूस कर बैठे बच्चे

    साहब लोगों की सड़क सुरक्षा के तहत स्कूली बसों में बच्चों को ओवरलोड बैठने की चिंता चौकी पर खूब नजर आती है पर चौक पर जितना नामी गिरामी उतनी पुराना स्कूल उतनी हीं पुरानी प्रदूषण फैलाती सडक पर बसों में झमता से दुगना बैठे बच्चे नजर नहीं आती. आएंगे भी कैसे नेताजी की भी साहब से कनेक्शन भी तो है.

    इंतजार का फल मीठा होता है

    घबराने की जरूरत नहीं है इंतजार कीजिए फुटबॉल का मैदान में हरियाली आ रही है. थोड़ी और सजाने संवारने दीजिए, क्योंकि नेताजी का विकास का ड्रीम प्रोजेक्ट है और गढवा शहर की आन बान शान है.नवनिर्मित फुटबॉल मैदान कुछ महीने निर्माण में लगे. कुछ महीने सजाने सवारने में. घास वास लग गया है,हरियाली बड़ रही है. इंतजार का फल मीठा होता है इंतजार करते रहिए कभी न कभी तो सर्व सुलभ होगा ही.

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    पलामू का हॉट सीट बना गढ़वा

    पलामू प्रमंडल के नौ सीटों में गढ़वा विधानसभा क्षेत्र हॉट सीट बन गया है. क्योंकि यहां पर अभी से नेताजी लोगों के बीच गला काट प्रतिस्पर्धा दिखाई देने लगी है. एक दूसरे को पीछे छोड़कर आगे बढ़ाने की होड में नेताजी लोगों ने कुबेर का खजाना अभी से खोल दिया है. मतलब साफ है की गढ़वा का चुनाव हाईटेक व्यवस्था से सुसज्जित होगा. कार्यकर्ता समर्थक की बल्ले बल्ले रहेगा.

    चर्चा बगैर सिर पैर का

    पिछले कुछ दिनों से गढ़वा विधानसभा सीट एनडीए का घटक दल आजसू एवं जदयू ले सकता है.जैसी बगैर सिर पैर की चर्चा चौक चौराहा पर शुरू हो चुकी है. पता नहीं चर्चा के पीछे कितना हकीकत कितना फंसाना है. पर आजसू की चर्चा के पीछे पिछले कुछ महीने पहले आजसू में शामिल हुए एक चुनाव लडृने की महत्वकांक्षा पाले नेताजी की प्रमुख भूमिका मानी जा रही है. वही जादयू की झोली में जाने के चर्चा के पीछे सिंबल के लिए भटक रही एक ऐसे नेताजी की आत्मा की आवाज माना जा रहा है. जो इस इस बार अपना आखिरी चुनाव मानकर सब कुछ लूटाने को तत्पर दिख रहे हैं.

    नेताजी का संगठन में बढ़ते कद से विरोधी उदास


    भाजपा के टिकट की दौड़ में शामिल एक नेताजी का पार्टी के संगठन में बढ़ते कद से टिकट की दौड़ में शामिल बाकी नेताजी लोग टिकट की दावेदारी कमजोर महसुस कर उदास होने लगे हैं. नेताजी का संगठन में कद काठी बढ़ने के पीछे जो तर्क दिया जा रहा है.उसके अनुसार गढ़वा जिला भाजयुमो तथा किसान मोर्चा का अध्यक्ष अपने समर्थक को बनवाने में मिली कामयाबी से जोड़कर देखा जा रहा है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि भाजपा का जिला अध्यक्ष बनते समय की बात कुछ और थी, पर अभी की कुछ और है.नेता जी के पार्टी नेतृत्व के अंदर के पावर में आसमान जमीन का अंतर आ गया है. अब गढ़वा जिला संगठन में वही होगा जो नेताजी चाहेंगे.

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    अपने गिरेबान में भी झांक लीजिए नेताजी

    नेताजी झारखंड को लूटतंत्र से मुक्ति दिलाने की आज बात कर रहे है. जब उनको मौका मिला था तो इतना लूटे कि आज तक इडी से पीछा नहीं छुड़ा पाएं है. अभी भी कई संपत्ति इडी से अटैच है. दरअसल नेताजी लोग एक अलग तरह की जीवाणु होते हैं अपने गिरेबान में नहीं झांकेंगे पर दूसरों पर छिंटाकस्सी करने में आगे रहेंगे.

    बोलती बंद हो गई नेताजी की

    नेताजी बड़े शान शौकत के साथ आदिवासी दिवस पर महोत्सव मनाने पहुंचे थे. आदिवासियों की राजनीतिक पार्टी होने का दंभ में कार्यक्रम में बैठे थे. अच्छी खासी आव भगत से गदगद भी थे. पर एक आदिवासी नेता ने मंच से जब भ्रष्टाचार का पोल खोलने शुरू किया तो नेताजी की रंगत उड़ गई. अगल-बगल में झांकने लगे.चेहरे की रंग देखते बन रही थी. हां कुछ लिख पढ़ कर कागज के बदले मोबाइल पर नार्मल होने का प्रयास करते दिख रहे थे, पर चेहरे के हाव-भाव से साफ छलक रहा था की मंच से आदिवासी नेता जो भ्रष्टाचार का पोल खोलने की हिमाकत कर रहा है. वह मजबूरी में बर्दाश्त करना पड़ रहा है.

    नेताजी से ज्यादा समर्थक उत्साही

    एक नेताजी इन दोनों परिवर्तन यात्रा पर हैं, भले ही नेताजी अपने बेदखल हुए राजनीतिक जमीन पर अपने स्वभाव के विपरीत खजाना खोलकर खाक झानते फिर रहे हैं. पर अंधभक्त समर्थकों को ऐसा लग रहा है . मानो नेताजी को अपार जनसमर्थन मिल रहा है.लिहाजा लखपति वोटर का मालिक होने का अभी से दावे कर रहे हैं. लगता है इस बार उनके नेता जी के अलावा दूसरे का चुनाव में खाता भी नहीं खुलनेवाला है.

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    Location: Garhwa

    नेताजी असमंजस में

    नेताजी असमंजस में है.असमंजस के पीछे कुलाधिपती पुत्र को विधायक बनाने की चाहत है. इक्षा तो विरासत सौपने की है. पर पार्टी पत्ता खोल तब तो, पहले पार्टी सिंबल दे, यह अभी पक्का नहीं है,फिर घर परिवार और क्षेत्र में समर्थन मिले. इसे लेकर भी संशय है.पर हैं बड़ा जुगाड़ू ,शायद जुगाड़ बैठा ही लेंगे.

    तारीफ करनी होगी नेताओं की सेवा भाव का


    जिस तरह से आजकल जनता की सेवा के लिए नेताजी लोग कसीदे पढ़ रहे हैं लगता है गढ़वा विधानसभा क्षेत्र की जनता का अचानक लाटरी लग गयी है. एक नेताजी जनता की समस्या का घर- घर पहुंचकर निदान कर रहे हैं, तो दुसरे निदान के लिए दफ्तर खोले फिर रहे हैं, तीसरे तो लगता है अभी टिकटे के फिराक में हांफ रहे है.

    चट मंगनी पट विवाह

    विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ गया है, आधी आबादी महिलाओं को खुश करने के लिए मंइयां योजना से सरकार को1000 रुपए का गिफ्ट देना की जल्दी है. चुनाव आयोग किसी भी समय चुनाव का घोषणा कर इस पर ग्रहण लगा सकता है, इसका दबाव भी सरकार से है. ऐसे में अधिकारी चट मंगनी पट विवाह के तर्ज पर मइयां योजना के तहत आवेदन, जांच पड़ताल, ऑनलाइन और भुगतान करने की रास्ते में दौड़ते दौड़ते हांफ रहे हैं.

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    ताक-झांक

    हमहू ही दावेदार

    धरती पकड़ नेताजी रेस है, अबकी बार भी घरवापसी किए पर्टिये से चुनाव लडेगे. नेताजी का दावा है कि अबकी टिकट ले हीं लेंगे. हलाकि इनका दावा पर कौन यकिन करेगा कि घर वापसी पार्टी से टिकट नहीं मिला तो चुनावी मैदान में नहीं ही उतरेंगे. जिद्दी स्वभाव के गुसैल परशुराम के खानदान के है. जिस पार्टी से आज टिकट मांगते फिर रहे हैं. उसी से बगावत कर फरसा लेकर चुनाव में कुद जांएगे


    फिर मजधार में फंसे हैं

    अबकी बार सत्ता का स्वाद नेताजी को भाएगा, अथवा पिछले चुनाव की तरह झखमार निर्दलीए मैदान में उतरना पड़ेगा कहना मुश्किल है. निर्दलीय उतरकर क्या करेंगे देखा नहीं था पिछले चुनाव में चेचारिया से भवनाथपुर मोड भीड़ ठसम ठस्स थी,पर गिनती के दिन तीसरे पायदान पर आ गए.


    नेताजी का संवाद

    नेताजी का संवाद कार्यक्रम बड़ा ही रोचक मोड़ पर आ गया है. गांव में पहुंचते से पहले ही आबादी का हिसाब किताब लगा रहता है,काफिले में शामिल गाड़ी पर फूल माला भी जरूरत के अनुसार स्टोरेज रहता है. बस गांव में संवाद कार्यक्रम के नाम पर पहुंचना है और कुछ लोगों को माला पहनाकर आबादी के हिसाब से पार्टी में शामिल करने की दावेदारी का प्रेस रिलीज जारी कर देना है.


    पुरानी पार्टी का बी टीम

    चुनावी मौसम में टिकट का जुगाड़ में धोखा ना हो जाए इसलिए नेताजी सतर्क हैं. सब रास्ता खुला है.पर पुरानी पार्टी का भी अच्छा भला साथ मिल रहा है. पुरानी पार्टी की बैठक में सहयोगियों को शामिल होने की छूट है. और परिवर्तन यात्रा में भी गलबहिंयां मिलवाने में परहेज नहीं है. क्योंकि नेताजी भी तो पुरानी पार्टी में है भी और नहीं भी हैं इसलिए कि पुरानी पार्टी से अपेक्षा तो है पर भरोषा नहीं हैं. लिहाजा मौका मिला तो ए टीम से मैदान में उतर जाएंगे.नहीं तो निर्णय लेने का माहौल बनाकर रखना है.

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  • ताक-झांक

    Location: Garhwa

    विरासत की जगहंसाई

    कमाल है भाई पहले गिरिनाथ फिर सत्येंद्रनाथ और आखिरी में पहुंच हीं गए मिथिलेश के पास । वैसे बड़े लोहियावादी खानदान से इनका तालुकात रहा है। इन्हें प्रखर लोहिया वादी नेता की विरासत मिली थी । समाजवाद का रखवाला परिवार की पहचान थी। पर विरासत को संभाल नहीं पाए और अवसरद की राह पर चल दिए हैं

    माला पहनो, नेता जी के बगल में फोटो खिंचवा लो

    गजब की राजनीति है कोई पंचायत पंचायत घूमकर हाईटेक व्यवस्था के सहारे समीकरण तैयार कर रहा है तो कोई भोजन पानी चापानला बोर कराकर। इससे भी आगे बढ़कर अब तो तीर्थ यात्रा भी कराया जा रहा है। चलो भाई बहुत सुविधा है अरे नहीं यह सब पैसे का खेल है। यहां तो अब कोई वोटर नहीं रह गया है सब के सब नेताजी से माला पहनकर किसी ने किसी पार्टी में सेट हो जा रहा है। बेरोजगारी के इस दौर में बेहतर मौका है। माला पहनो और नेताजी के बगल में फोटो खिंचवा लो । कम से कम चुनाव तक तो रोजगार मिल ही जाएगा चुनाव बाद क्या होगा सब जानते हैं

    आराम हराम हो गया है

    मुख्यमंत्री मंइयां योजना ऐसी बला है, जिससे पीछा छुड़ाना मुश्किल है। ऑनलाइन में थोड़ा आराम था सर्वर डाउन के बहाने काम चल जा रहा था। पर सरकार ने तो ऑफलाइन की भी बात कर दी। आवेदन को रिसीव करना, फिर उसे एक-एक कर तरासना बड़ी भारी मुश्किल है। सचमुच में आराम हराम हो गया है।

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    Vivekanand Upadhyay

    Location: Garhwa Vivekanand Updhyay is the Chief editor in AapKiKhabar news channel operating from Garhwa.

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