
Location: Garhwa
झारखंड के ग्रामीण इलाकों में गरीबों के लिए सरकार द्वारा हर साल ठंड के मौसम में कंबल वितरण की योजना बनाई जाती है। लेकिन इस बार कंबल वितरण का हाल ऐसा है कि इसे महज एक औपचारिकता कहा जा सकता है। ठंड का मौसम अब समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, पर गरीबों तक कंबल अभी तक नहीं पहुंचा है।
ग्रामीणों की बेबसी
गढ़वा जिले में पंचायत स्तर पर हर वर्ष कंबल वितरण की प्रक्रिया होती है, लेकिन इस बार यह बेहद विलंब से शुरू हुई। सूत्रों के अनुसार, तीन-चार दिन पहले मुखियाओं को प्रखंड कार्यालय से कंबल उठाने का आदेश मिला है। यह देरी गरीबों के लिए मुसीबत बन गई है। ठंड के सबसे कठोर दिनों में, जब गरीबों को कंबल की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब सरकार की योजनाएं कागजों में उलझी रहीं।
ठंड में जीने की जद्दोजहद
कई गांवों में लोग ठंड से बचने के लिए लकड़ी जलाकर रात गुजारते नजर आए। परिवार के बुजुर्ग और छोटे बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। गरीब तबके के लोगों के पास न पर्याप्त गर्म कपड़े हैं और न ही ऐसी जगह जहां वे ठंड से बच सकें। ऐसे में कंबल वितरण का सरकारी दावा उनकी पीड़ा का मजाक उड़ाता प्रतीत होता है।
वास्तविकता बनाम दावा
सरकारी रिकॉर्ड में कंबल वितरण के लिए बजट और आदेश जारी होते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर नहीं दिखता। कई मुखियाओं ने बताया कि कंबल उठाने के आदेश तो मिले हैं, लेकिन कंबल की संख्या बेहद सीमित है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि हजारों गरीबों में कंबल कैसे बांटे जाएंगे और वितरण प्रक्रिया में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाएगी।
आमजन का सवाल
गरीबों का सवाल है कि जब ठंड खत्म होने को है, तब कंबल मिलने से क्या फायदा? उनका कहना है कि हर बार की तरह इस बार भी कंबल वितरण सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गया है। जो कंबल पहले मिलने चाहिए थे, वे अब ठंड कम होने के समय बांटे जा रहे हैं।
सरकार से अपेक्षा
इस स्थिति में सरकार को कंबल वितरण जैसी योजनाओं को समय पर लागू करने और जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए। इसके साथ ही ऐसी नीतियां बनाई जानी चाहिए, जो गरीबों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ठंड से राहत प्रदान कर सकें।
गरीबों के लिए ठंड का यह मौसम उनकी असहायता और प्रशासन की उदासीनता की कहानी कहता है। सवाल यह है कि क्या सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक रूप से उन तक पहुंच पाता है, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है?