चैता गायन: भारतीय लोकसंस्कृति की मधुर और जीवंत परम्परा ; नीरज श्रीधर ‘स्वर्गीय’

Location: Garhwa



भारतीय लोकसंस्कृति अत्यंत समृद्ध, व्यापक और विविधतापूर्ण रही है। भारत का जनजीवन ऋतुओं, पर्वों और मासों के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां प्रत्येक ऋतु और प्रत्येक मास के साथ अनेक लोकपरम्पराएँ और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ विकसित हुई हैं। इन्हीं लोकपरम्पराओं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और लोकप्रिय परम्परा है चैत्र मास में गाया जाने वाला “चैता”। चैता गायन की परम्परा अत्यंत प्राचीन मानी जाती है और यह विशेष रूप से उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित रही है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखण्ड तथा आसपास के क्षेत्रों में चैता लोकगायन आज भी लोकजीवन का अभिन्न अंग बना हुआ है।
हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास को वर्ष का पहला महीना माना जाता है। यह समय बसंत ऋतु के अंतिम चरण का होता है, जब प्रकृति अपने सौंदर्य के चरम पर होती है। खेतों में रबी की फसलें पककर तैयार हो जाती हैं, आम के वृक्षों में बौर आ जाते हैं और चारों ओर हरियाली तथा मधुर सुगंध फैल जाती है। वातावरण में एक विशेष प्रकार की उमंग और उल्लास का संचार होता है। ऐसे मनोहर और आनंदमय वातावरण में ग्रामीण जन अपने हृदय की भावनाओं को गीतों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। इन्हीं गीतों को “चैता” कहा जाता है।
चैता गायन की विशेषता यह है कि इसमें लोकजीवन की सहजता, सादगी और भावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। इन गीतों में प्रेम, विरह, मिलन, प्रकृति की सुंदरता, सामाजिक संबंधों तथा मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। कहीं नवयौवन की मादकता और उमंग झलकती है तो कहीं प्रिय के वियोग की करुण वेदना। कई चैता गीतों में नायिका अपने प्रियतम की प्रतीक्षा करती दिखाई देती है, तो कहीं प्रकृति के सौंदर्य का सजीव वर्णन मिलता है। यही कारण है कि चैता गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे लोकमानस की गहरी भावनाओं को भी अभिव्यक्त करते हैं।
चैता गायन की परम्परा मुख्यतः ग्रामीण समाज से जुड़ी रही है। इसके गायक प्रायः गांवों के साधारण किसान, मजदूर या ग्रामीण कलाकार होते हैं, जिनके भीतर संगीत और लोकसंस्कृति के प्रति स्वाभाविक प्रेम होता है। इन कलाकारों ने भले ही शास्त्रीय संगीत की औपचारिक शिक्षा न प्राप्त की हो, किंतु उनकी आवाज़ में लोकजीवन की सच्चाई और आत्मीयता स्पष्ट झलकती है। यही कारण है कि उनके द्वारा गाए गए चैता गीत श्रोताओं के हृदय को गहराई से स्पर्श करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में चैत्र मास की संध्या अथवा रात्रि के समय गांव के चौपाल, आंगन या किसी खुले स्थान पर चैता गायन का आयोजन किया जाता है। गांव के लोग एकत्र होकर गायक मंडली के साथ इन गीतों का आनंद लेते हैं। ढोलक, मंजीरा, झांझ और कभी-कभी हारमोनियम जैसे वाद्ययंत्रों की संगत में चैता गाया जाता है। कई स्थानों पर यह गायन प्रश्न-उत्तर शैली में भी होता है, जिसमें एक गायक गीत का मुखड़ा उठाता है और अन्य गायक उसका समर्थन करते हुए स्वर मिलाते हैं। इस सामूहिकता के कारण चैता गायन केवल एक सांगीतिक कार्यक्रम नहीं रह जाता, बल्कि यह सामाजिक मेल-मिलाप और सामुदायिक सौहार्द का भी प्रतीक बन जाता है।
चैता गीतों की भाषा भी अत्यंत सरल, सहज और लोकप्रचलित होती है। इन गीतों में प्रायः भोजपुरी, मगही, मैथिली और अवधी जैसी लोकभाषाओं का प्रयोग किया जाता है। यही कारण है कि सामान्य जन इन गीतों को आसानी से समझ पाते हैं और उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं। इन गीतों में प्रकृति का सुंदर चित्रण, ग्रामीण जीवन की झलक तथा मानवीय संवेदनाओं की गहराई स्पष्ट दिखाई देती है। लोकभाषाओं की मधुरता और सहजता इन गीतों को और अधिक आकर्षक बना देती है।
चैता गायन की परम्परा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारी लोकसंस्कृति की अमूल्य धरोहर भी है। इसके माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी लोकपरम्पराएँ और सांस्कृतिक मूल्य आगे बढ़ते रहे हैं। गांवों के बुजुर्ग कलाकार अपने अनुभव और कला को नई पीढ़ी को सिखाते हैं, जिससे यह परम्परा निरंतर जीवित बनी रहती है। यह परम्परा केवल संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण समाज की सामूहिकता, संवेदनशीलता और सांस्कृतिक चेतना को भी अभिव्यक्त करती है।
आधुनिक समय में जब शहरीकरण और आधुनिक मनोरंजन के साधनों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, तब लोकपरम्पराओं के सामने कई चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं। फिर भी चैता गायन की परम्परा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी चैत्र मास के आगमन के साथ ही चैता की मधुर ध्वनि सुनाई देने लगती है। कई सांस्कृतिक संस्थाएँ, लोककलाकार और सामाजिक संगठन भी इस परम्परा को संरक्षित और प्रोत्साहित करने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं।
वास्तव में चैता गायन हमारी लोकसंस्कृति की आत्मा का प्रतीक है। इसमें प्रकृति, प्रेम, विरह और लोकजीवन की सरलता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यदि हम इस परम्परा को संजोकर रखें, इसके कलाकारों को सम्मान दें और नई पीढ़ी को इससे परिचित कराएँ, तो यह अमूल्य लोकधरोहर आने वाले समय में भी अपनी मधुरता और सांस्कृतिक गरिमा के साथ जीवित बनी रहेगी। चैता की मधुर ध्वनि सदियों से भारतीय लोकजीवन को आनंद और संवेदना से भरती रही है और भविष्य में भी यह परम्परा हमारी सांस्कृतिक पहचान को सशक्त बनाती रहेगी।

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  • Pavan Kumar

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