Location: रांची
रांची: अपने मंत्री जी पिछले कुछ दिनों से नाराज हैं. उनकी बात कोई सुनने को तैयार नहीं है. सरकार में नंबर दो की हैसियत है. फिर भी पत्र का जवाब तक नहीं मिल रहा है. जवाब देने का टाइम लाइन बीत गया. लेकिन अपने विभाग के सचिव ने भी जवाब नहीं दिया. पीड़ा तो गहरी है. लेकिन किससे कहें. क्या कहें. व्यवस्था ही ऐसी है. इस सरकार में व्यवस्था में सुधार की कल्पना बेकार है. मंत्री जी से चूक हो गई. उन्होंने नहीं समझा था कि उनके पत्र का यह हश्र होगा. यदि समझते तो न पत्र लिखते न सुरक्षा वापस करते. अंदर गड़बड़ी थी. लेकिन बाहर तो ठीक-ठाक ही चल रहा था. प्रतिष्ठा बची हुई थी.
पत्र और सुरक्षा वापसी के मुद्दे पर सरकार के मुखिया के साथ पार्टी भी मौन है. पीड़ा गहरी हो, रास्ता नहीं दिख रहा हो तो फिर सहारा कविता और शेरो शायरी का ही बचता है. मंत्री जी ने आज फिर एक शायरी लिख डाली. समझने वाले इसके मायने समझ रहे हैं और समझा भी रहे हैं.
बरसात का मौसम है. इसलिए उमस है. राजनीति में भी उमस है. इसीलिए मंत्री जी ने लिखा= इन बारिशों से इतनी दोस्ती अच्छी नहीं, कच्चा तेरा मकान है कुछ तो ख्याल रखो.











