Location: Garhwa
बिहार की राजनीति एक बार फिर अपनी पुरानी लय में लौट आई है — गठबंधन के जोड़-घटाव, जातीय समीकरणों की गहमागहमी और बेरोजगारी से उपजे जन-असंतोष के बीच। चुनाव की हलचल में जो सबसे स्पष्ट दिखाई देता है, वह है मतदाताओं का मन — अस्थिर, असंतुष्ट और विकल्प की तलाश में।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए का चेहरा हैं, लेकिन उनके सामने चुनौती अब पहले से कहीं अधिक गहरी है। लम्बे शासन के बाद उनकी “सुसाशन बाबू” की छवि कमजोर पड़ी है। विकास के आंकड़े कागज पर ठीक लगते हैं, पर रोज़गार की हकीकत से जनता नाखुश है। युवा मतदाता, जो कभी ‘नौकरी, नहीं तो सरकार बदलेगी’ के मूड में था, अब खुले तौर पर बेरोजगारी को चुनावी मुद्दा बना रहा है।
वहीं विपक्षी इंडिया गठबंधन की कमान तेजस्वी यादव संभाले हुए हैं। उन्होंने अपनी राजनीति को ‘न्याय’ और ‘रोजगार’ के नारे पर केंद्रित किया है। उनकी सभाओं में भीड़ दिखती है, पर राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि भीड़ को वोट में बदल पाना अब भी आरजेडी के लिए आसान नहीं है। यादव-मुस्लिम समीकरण उनका मजबूत आधार है, लेकिन बिहार की चुनावी कहानी सिर्फ दो जातियों की नहीं है — यहां 36 प्रतिशत बहुत पिछड़े (EBC) और 27 प्रतिशत अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) हैं, जिनकी पसंद ही परिणाम तय करती है।
इस बार एनडीए और इंडिया गठबंधन की तुलना में तालमेल का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इंडिया गठबंधन के भीतर उम्मीदवार चयन, प्रचार रणनीति और नेतृत्व को लेकर समन्वय की कमी दिख रही है, जबकि एनडीए ने अपने प्रचार अभियान को पहले से अधिक संगठित ढंग से आगे बढ़ाया है। खासकर नीतीश कुमार जिस तरह से पूरी सक्रियता के साथ प्रचार में कूद पड़े हैं, उससे मतदाताओं के बीच उनके प्रति विश्वास फिर से मजबूत होता दिख रहा है। उन्होंने अपने अनुभव, विकास योजनाओं और “स्थिर सरकार” की अपील को केंद्र में रखकर चुनाव को व्यक्तित्व आधारित बना दिया है।
नए समीकरणों में जन सुराज पार्टी का उभार भी दिलचस्प है। सर्वे बताते हैं कि यह नया दल करीब 6-7 प्रतिशत वोट हासिल कर सकता है। दिखने में यह छोटा आंकड़ा है, लेकिन अगर ये वोट एनडीए या इंडिया ब्लॉक के पारंपरिक इलाकों में कटे, तो कई सीटों का गणित उलट सकता है।
चुनाव का माहौल फिलहाल एनडीए के पक्ष में झुका हुआ दिखता है। शुरुआती सर्वे में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन को लगभग 44 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है, जबकि इंडिया ब्लॉक को 36 प्रतिशत के आसपास। पर यह बढ़त निर्णायक नहीं है — बिहार की राजनीति में दो-तीन प्रतिशत वोट का झुकाव भी सत्ता पलट देता है।
मुद्दों की बात करें तो रोजगार, पलायन और शिक्षा व्यवस्था सबसे ऊपर हैं। बड़ी संख्या में युवाओं को अब भी राज्य छोड़कर दिल्ली, पंजाब या गुजरात जाना पड़ रहा है। इस असंतोष ने नीतीश सरकार की नींव को थोड़ा हिला दिया है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार की योजनाओं — विशेषकर मुफ्त राशन, आवास योजना और महिला लाभार्थियों के लिए जारी प्रोत्साहनों — ने एनडीए को कुछ राहत दी है।
राज्य की राजनीतिक बहस अब “स्थिरता बनाम परिवर्तन” की दोधारी तलवार पर टिकी है। नीतीश कुमार स्थिरता और प्रशासनिक अनुभव का चेहरा हैं, जबकि तेजस्वी यादव परिवर्तन और युवा उम्मीदों का। लेकिन इन दोनों के बीच बिहार का मतदाता उलझा हुआ है — उसे न तो सत्ता पूरी तरह खल रही है, न ही विपक्ष पर पूरा भरोसा है।
गठबंधन की राजनीति इस चुनाव की आत्मा है। बीजेपी और जेडीयू के बीच आंतरिक समीकरण अब अपेक्षाकृत सहज दिख रहे हैं, जबकि इंडिया गठबंधन में असंतुलन अभी भी बना हुआ है। ऐसे में, अगर किसी तीसरे दल या निर्दलीय उम्मीदवार ने कुछ सीटें खींच लीं, तो तस्वीर पल भर में बदल सकती है।
बिहार चुनाव 2025 दरअसल सिर्फ सत्ता बदलने का चुनाव नहीं है, यह भरोसे के नवीनीकरण की परीक्षा है। जनता अब सिर्फ वादों से नहीं, काम के ठोस प्रमाण चाहती है। नीतीश कुमार के अनुभव और तेजस्वी यादव की ऊर्जा के बीच यह लड़ाई अंततः मतदाता की उम्मीदों से तय होगी।
और अंत में — बिहार की राजनीतिक ज़मीन सूखी नहीं, बल्कि नम है; बस हल्की-सी बारिश और पूरा रंग बदल सकता है।











