धरती पर अवतार भी समय देखकर ही होता है : विनोद पाठक

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प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक स्वर्णिम अवसर आता है, पहचानने की जरू

गढ़वा : प्रकृति में सबसे बड़ा महत्व समय का होता है. समय पर ही सुबह-शाम होता है, समय पर ऋतु परिवर्तन होता है और समय पर ही युग परिवर्तन भी होता है. धरती पर अवतार भी समय देखकर ही होता है. यह बात गायत्री परिवार के विनोद पाठक ने कही. वे गायत्री शक्तिपीठ कल्याणपुर मंदिर परिसर में आयोजित श्रीराम कथा के दूसरे दिन प्रवचन कर रहे थे. उन्होंने कहा कि बस समय को पहचानने की जरूरत होती है. प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक स्वर्णिम अवसर आता है. एक क्षण व्यक्ति की दिशा को बदल सकता है. बशर्ते व्यक्ति उस बदलाव के क्षण(टर्निंग प्वाइंट) को पहचान ले और उसका उपयोग कर पाये. रत्नाकर डाकू के जीवन में बदलाव का जब समय आया, तो उसको नारदजी से सामना हुआ. उसने नारदजी की बात को मानकर अपने को बदला और डाकू से महर्षि वाल्मिकी बन गये. अंगुलीमाल डाकू ने गौतम बुद्ध की बात मानी और वह भी बड़े महर्षि हो गये. आधुनिक युग में मोहनदास करमचंद गांधी ने हरिश्चंद्र नाटक देखी तो उनका हृदय परिवर्तित हो गया और उन्होंने संकल्प लिया कि वे सत्य का अनुसरण करेंगे और वे महात्मा गांधी बन गये. पूर्व राष्ट्रपति अबुल कलाम आजाद युवावस्था में निराश होकर ऋषिकेश में गंगा में डूबकर आत्महत्या करनेवाले थे, लेकिन उन्हें वहां परमार्थ निकेतन के एक संन्यासी का सानिध्य मिला तो वे एक बड़े वैज्ञानिक और बाद में चलकर भारत के राष्ट्रपति तक बने. श्री पाठक ने कहा कि मनुष्य के जीवन में कई बार ऐसे अवसर आते हैं कि प्रकृति उसे उज्जवल भविष्य की ओर ले जाने के लिये इशारा करती है, लेकिन अधिकांश मनुष्य का दुर्भाग्य होता है कि वह प्रकृति के सूक्ष्म इशारे को समझ नहीं पाता है. बहुत से लोगों को आलस, प्रमाद घिरे रहता है, जिसके कारण वे प्रकृति के अनुकूल अपने को ढाल नहीं पाते हैं. परिणामस्वरूप वे सामान्य जीवन तक सीमीत रह जाते हैं. श्री पाठक ने कहा कि अवतार भी हमेशा थोड़े होता है. धरती पर अवतार भी समय देखकर ही होता है. तबतक मनुष्य को अपनी प्रतिकूल परिस्थितियों का खुद से सामना करना होता है. यह समय मनुष्य को अपना पुरूषार्थ दिखाने का होता है. जब परिस्थितियां इतनी विकट हो जाती हैं कि वह मनुष्य के सामर्थ्य से बाहर हो जाता है, तो फिर अवतारी चेतना धरती पर आती है. वह अधर्मियों को दंडित कर फिर से धर्म की स्थापना करती है. श्रीराम कथा में व्यास शिवपूजन मेहता, सह व्यास उपेंद्र शर्मा ने विभिन्न भजनों के माध्यम से श्रीराम कथा को प्रभावी बनाने का काम किया. रंजीत विश्वकर्मा ने बेंजो पर, श्याम सुंदरजी ने ढोलक पर तथा नंदू ठाकुर ने झाल पर संगत किया.

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  • Pavan Kumar

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