Location: Garhwa
गढ़वा नगर निकाय चुनाव में मतदान की तारीख 23 फरवरी नजदीक आते ही राजनीतिक सरगर्मी चरम पर है। चुनाव प्रचार का शोर थमने के समय 21 फरवरी जैसे जैसे नजदीक आ रहा है ,प्रत्याशियों की निगाहें मतदाताओं के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं। दिलचस्प बात यह है कि सार्वजनिक तौर पर मतदाता चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन इसी खामोशी ने चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों की बेचैनी बढ़ा दी है।
इस बार मुकाबला चतुष्कोणीय माना जा रहा है। भाजपा समर्थित कंचन जायसवाल, झामुमो समर्थित संतोष केशरी, अलखनाथ पांडेय और आशिष सोनी उर्फ दौलत सोनी के बीच सीधी टक्कर महसूस की जा रही है। इसके साथ ही झामुमो के बागी मासूम राजा भी मैदान में हैं, जो अपने समुदाय की गोलबंदी के सहारे चमत्कारी चुनाव परिणाम बनाने की कोशिश में हैं। स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चाओं में इन्हीं नामों के इर्द-गिर्द संभावित जीत-हार के आकलन किए जा रहे हैं।
जमीनी स्थिति पर नजर डालें तो फिलहाल जातीय समीकरण स्पष्ट रूप से प्रभावी दिख रहे हैं। जिस प्रत्याशी की जो सामाजिक पृष्ठभूमि है, उस समुदाय का बड़ा हिस्सा उसके समर्थन में लामबंद नजर आ रहा है। वार्ड स्तर पर बैठकों, आपसी संवाद और सामाजिक नेटवर्क के माध्यम से मतों को एकजुट रखने की कोशिशें जारी हैं। हालांकि सभी प्रमुख प्रत्याशियों का अपना-अपना मजबूत जातीय आधार है, जिससे मुकाबला और अधिक संतुलित हो गया है।
इसके साथ ही पार्टी फैक्टर को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भाजपा और झामुमो जैसे संगठित दलों की चुनावी मशीनरी सक्रिय है। बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थायी वोट बैंक के साथ साथ केनद्रीय एवं राज्य स्तरीय नेताओं का त्याशियों के पक्ष में चुनावी दौरा के सहारे माहौल बनाने में जुटे हैं। कई मतदाता पार्टी की विचारधारा, राज्य और केंद्र स्तर की राजनीतिक परिस्थितियों तथा संगठन की मजबूती को भी ध्यान में रखकर अपना निर्णय तय कर रहे हैं।
नगर निकाय चुनाव होने के कारण स्थानीय मुद्दे भी अहम भूमिका में हैं। शहर की सफाई व्यवस्था, पेयजल संकट, जल निकासी, सड़क मरम्मत, स्ट्रीट लाइट और बाजार प्रबंधन जैसे विषय मतदाताओं के बीच चर्चा में हैं। मतदाता यह भी देख रहे हैं कि कौन प्रत्याशी सुलभ और जवाबदेह रहेगा। व्यक्तिगत छवि, सामाजिक सक्रियता और व्यवहार भी मतदाताओं के आकलन का हिस्सा बने हुए हैं।
बागी उम्मीदवार की उपस्थिति ने समीकरण को और जटिल बना दिया है। यदि वे अपने समुदाय का उल्लेखनीय वोट खींचने में सफल होते हैं, तो मुख्य दावेदारों के गणित पर सीधा असर पड़ सकता है। यही कारण है कि प्रमुख प्रत्याशी अंतिम समय तक अपने-अपने समर्थक वर्ग को साधने में जुटे हैं।
इन सबके बीच सबसे निर्णायक भूमिका गैर-जातीय और अनिर्णीत मतदाताओं की मानी जा रही है। यही वह वर्ग है जो जाती से अलग हटकर मतदान करता है और अंतिम परिणाम की दिशा तय कर सकता है। यदि यह वोट जिसके पक्ष में स्पष्ट रूप से जाता है तो परिणाम अपेक्षाकृत साफ हो सकता है, अन्यथा मुकाबला बेहद करीबी रहने की संभावना है।
कुल मिलाकर गढ़वा में इस बार चुनावी तस्वीर पूरी तरह अभी तक स्पष्ट नहीं है। जातीय गोलबंदी, पार्टी की ताकत और प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि—तीनों कारक समान रूप से प्रभाव डाल रहे हैं। अब सभी की निगाहें 23 फरवरी पर टिकी हैं, जब मतदाता अपनी चुप्पी तोड़कर बैलेट पेपर के जरिए अपना फैसला सुनाएंगे।











