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रांची : राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी को लेकर स्थिति साफ हो गई। जदयू ने उन्हें तीसरी बार उम्मीदवार नहीं बनाया। इसकी संभावना पहले से ही व्यक्त की जा रही थी। 9 अप्रैल को हरिवंश जी का कार्यकाल समाप्त होगा। इसके बाद उनकी भूमिका क्या होगी।
उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर मेरे पास कोई पक्की सूचना तो नहीं है, लेकिन मेरी जितनी राजनीतिक समझ है उससे मैं उम्मीद करता हूं कि आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री मोदी कोई न कोई जिम्मेदारी उन्हें दे सकते हैं। क्योंकि मोदी उन्हें पसंद करते हैं। हरिवंश जी विद्वान हैं। पढ़ने लिखने वाले हैं। इनके पास ज्ञान का अद्भुत भंडार है। कई चीजों पर मजबूत पकड़ है। बेदाग छवि है। राज्यसभा के उपसभापति का दायित्व भी उन्होंने बखूबी निभाया। कई देशों में भारत सरकार की ओर से देश का प्रतिनिधित्व किया। उपसभापति रहते हुए उनके संबंध मोदी के साथ-साथ भाजपा के बड़े नेताओं के साथ और प्रगाढ़ हुआ है। हरिवंश जी एक मात्र ऐसे उपसभापति रहे जिनका संबंध सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से बेहतर रहा है। सरकार को कभी संकट में नहीं डाला। जदयू जब एनडीए से अलग हुआ तब हरिवंश जी ने उपसभापति के पद से इस्तीफा नहीं दिया। उन्होंने संवैधानिक पद और मर्यादा का ख्याल रखते हुए इस्तीफा नहीं देने की बात कही थी। इस्तीफा के लिए उन पर दबाव भी नहीं था। उस वक्त बीजेपी ने भी हरिवंश जी का साथ दिया। हरिवंश जी का कहीं कोई विरोध नहीं है।
बिहार की राजनीतिक स्थिति, जातीय समीकरण और जदयू की नीतियों की वजह से वह तीसरी बार उम्मीदवार नहीं बन सके। लेकिन मुझे विश्वास है कि आने वाले दिनों में हरिवंश जी किसी नई भूमिका में नजर आएंगे। मोदी कहीं न कहीं हरिवंश जी को अवसर दे सकते हैं। हरिवंश जी की भूमिका क्या होगी यह तय मोदी ही करेंगे।











