Location: Garhwa
गढ़वा। दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन की खबर से पूरा झारखंड शोक में डूब गया है। वह न सिर्फ एक राजनेता थे, बल्कि झारखंड की आत्मा, उसकी चेतना और उसकी लड़ाई का सबसे प्रखर स्वर भी थे।
उनका जीवन महाजनी शोषण के विरुद्ध संघर्ष से शुरू होकर संसद और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा, लेकिन कभी भी उन्होंने ज़मीन से रिश्ता नहीं तोड़ा। गांवों, पहाड़ों, जंगलों और हर आदिवासी के दिल में आज भी ‘दिशोम गुरु’ बसते हैं।
एक संस्मरण: जब रांची की धरती हिल उठी थी…
मुझे आज भी वह दिन याद है — साल था 1988। मैं उन दिनों रांची विश्वविद्यालय में मास्टर डिग्री की पढ़ाई कर रहा था। शहर में चर्चा थी कि शिबू सोरेन मोराबादी मैदान में एक जनसभा को संबोधित करेंगे। सरकार की ओर से इस सभा पर रोक लगाई गई थी। प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद था।
लेकिन जैसे ही दोपहर में सभा का समय हुआ, दृश्य ही बदल गया। अचानक हजारों की संख्या में आदिवासी पुरुष, महिलाएं और बच्चे – सभी पारंपरिक पहनावे में, हाथों में तीर-धनुष लिए टीडी दल की तरह मोराबादी मैदान में उमड़ पड़े। किसी ने न नारा लगाया, न कोई प्रचार हुआ — लेकिन एक अदृश्य आह्वान ने उन्हें वहाँ खड़ा कर दिया था।
फिर मंच पर आए दिशोम गुरु शिबू सोरेन। उन्होंने आत्मविश्वास और ओज से भरा भाषण दिया। पूरा मैदान मंत्रमुग्ध होकर सुनता रहा। प्रशासन सिर्फ देखती रह गई। न कोई झड़प, न कोई हिंसा – सिर्फ जनबल और आत्मबल का अद्भुत उदाहरण।
यह दृश्य आज भी मेरी आंखों में ताज़ा है — यही था दिशोम गुरु का करिश्मा, यही था उनका जनसमर्थन।
संघर्ष से सत्ता तक का सफर
महाजनी प्रथा के खिलाफ शिबू सोरेन का आंदोलन महज सामाजिक नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और हक की लड़ाई थी। उन्होंने हजारों आदिवासियों को साहूकारों के जाल से मुक्त कराया। झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना कर उन्होंने राज्य के गठन की नींव रखी।
तीन बार वे झारखंड के मुख्यमंत्री बने और देश की संसद में आदिवासी समाज की आवाज बने।
दिशोम गुरु आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनके आदर्श और उनके संघर्ष की प्रेरणा हर झारखंडवासी के दिल में जीवित है। उनकी रैली का वो दिन, मोराबादी मैदान की वो दोपहर – आज भी साबित करती है कि जनसमर्थन जब विचारधारा से जुड़ता है, तो इतिहास रचा जाता है।











