Location: Garhwa
गढ़वा। प्रतिनिधि। गढ़वा जिले में नाग पंचमी के मौके पर आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। नाग पंचमी यहां केवल नाग देवता की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि सदियों पुरानी अखाड़ा परंपरा, महावीर झंडा और पारंपरिक लाठी-भाला प्रदर्शन के साथ इसे मनाने की विशेष परंपरा भी रही है। हालांकि आधुनिकता के दौर में यह प्राचीन परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है, लेकिन आज भी इसके कुछ स्वरूप गढ़वा शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिल जाते हैं।
नाग पंचमी के अवसर पर गढ़वा शहर तथा आसपास के विभिन्न गांवों के अखाड़ों में नाग देवता की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद अखाड़ों में महावीर झंडा स्थापित कर पारंपरिक तरीके से जुलूस निकाला जाता है। कई स्थानों पर यह जुलूस रामनवमी के जुलूस की तरह ही श्रद्धा और उत्साह के साथ निकाला जाता है।
महावीर झंडे के साथ अखाड़े के लोग पारंपरिक लाठी और भाला लेकर जुलूस में शामिल होते हैं। जुलूस के दौरान श्रद्धालु और अखाड़े के सदस्य ‘हरि बोल-हरि बोल’ के जयघोष से वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं। विभिन्न अखाड़ों से निकलने वाले जुलूस गढ़वा के प्रमुख बाजार और शहर के विभिन्न मार्गों से होते हुए मुख्य मार्ग तक पहुंचते हैं।
इस दौरान अखाड़ों के खिलाड़ियों द्वारा लाठी और भाला का आकर्षक प्रदर्शन भी किया जाता है। पारंपरिक युद्धकला के इन प्रदर्शनों को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते थे। महावीर झंडे के साथ निकला यह जुलूस शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
बताया जाता है कि गढ़वा में नाग पंचमी के अवसर पर इस प्रकार अखाड़ों के माध्यम से पूजा, जुलूस और पारंपरिक प्रदर्शन की परंपरा काफी पुरानी है। पहले नाग पंचमी के मौके पर शहर और ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर जुलूस निकलते थे और अखाड़ों में लाठी-भाला प्रदर्शन के साथ कई तरह के पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। समय के साथ इन आयोजनों में काफी कमी आई है।
इसके बावजूद नाग पंचमी के दिन आज भी कई स्थानों पर इस परंपरा की झलक देखने को मिलती है। अखाड़ों में पूजा-अर्चना के बाद महावीर झंडे के साथ जुलूस निकाला जाता है और ऐतिहासिक काली मंदिर पर पहुंचकर पूजा-पाठ के साथ कार्यक्रम का समापन किया जाता है।
गढ़वा की यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ जिले की लोक संस्कृति और सामाजिक एकजुटता की भी पहचान रही है। बुजुर्गों का कहना है कि नई पीढ़ी को इस परंपरा से जोड़ने तथा इसके संरक्षण की आवश्यकता है, ताकि आने वाले समय में नाग पंचमी से जुड़ी गढ़वा की यह विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत पूरी तरह विलुप्त न हो जाए।











