Location: Garhwa
गढ़वा नगर परिषद अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर शहर में राजनीतिक गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। सभी प्रत्याशी अपने-अपने समर्थकों के साथ विभिन्न वार्डों और मोहल्लों में जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं। जनसंपर्क के दौरान प्रत्याशी मतदाताओं से मिलकर समर्थन मांग रहे हैं और अपनी प्राथमिकताओं को बता रहे हैं। प्रचार के दौरान सभी प्रमुख उम्मीदवारों का व्यवहार और प्रस्तुति मुस्कराते चेहरे से मतदाता का सभी का स्वागत लगभग एक जैसी दिखाई दे रही है, जिससे मतदाताओं के वास्तविक रुझान का आकलन करना फिलहाल आसान नहीं हो पा रहा है।
चुनाव प्रचार में विकास, साफ-सफाई, पेयजल, सड़क, नाली और प्रकाश व्यवस्था जैसे स्थानीय मुद्दे प्रमुखता से उठाए जा रहे हैं। प्रत्याशी नगर परिषद क्षेत्र के समुचित विकास, पारदर्शी प्रशासन और जनसमस्याओं के त्वरित समाधान का आश्वासन दे रहे हैं। इसके बावजूद मतदाता खुलकर किसी एक पक्ष में दिखाई नहीं दे रहे हैं। आम चर्चा में लोग सभी प्रत्याशियों की तुलना करते नजर आ रहे हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से समर्थन व्यक्त करने से परहेज कर रहे हैं।
चुनाव में जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय समीकरण भी प्रभाव डालते दिखाई दे रहे हैं। अलग-अलग समुदायों और इलाकों में अपने-अपने प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश हो रही है। कई स्थानों पर स्थानीय पहचान और सामाजिक जुड़ाव भी महत्वपूर्ण कारक के रूप में उभर रहे हैं। इन परिस्थितियों में मतों का बंटवारा किस प्रकार होगा, यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता।
नगर परिषद अध्यक्ष पद की दौड़ में करीब एक दर्जन प्रत्याशी मैदान में हैं, लेकिन चुनावी चर्चा मुख्य रूप से कुछ प्रमुख चेहरों के इर्द-गिर्द केंद्रित है। भाजपा नेता अलखनाथ पांडे, भाजपा समर्थित कंचन जायसवाल, झारखंड मुक्ति मोर्चा समर्थित संतोष केसरी और दौलत सोनी के बीच मुख्य मुकाबले की चर्चा हो रही है। इनके अतिरिक्त मासूम राजा भी चुनावी मैदान में सक्रिय हैं और अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। विकास माली का नाम भी चुनावी समीकरण में लिया जा रहा है, हालांकि उनकी स्थिति को लेकर स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है।
वर्तमान स्थिति में चुनाव को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। प्रचार अभियान अभी जारी है और अंतिम दिनों में समीकरण बदलने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। मतदाताओं का अंतिम निर्णय ही चुनाव परिणाम तय करेगा, इसलिए फिलहाल किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी माना जा रहा है।











