Location: Garhwa
विशेष राजनीतिक समीक्षा | आपकी खबर
गढ़वा जिले की राजनीतिक दृष्टि से सबसे संवेदनशील मानी जाने वाली भवनाथपुर विधानसभा इन दिनों एक अलग वजह से सुर्खियों में है। यहां प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की तुलना में सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के भीतर उभर रहे अंतर्विरोध और गुटीय खींचतान अधिक चर्चा का विषय बने हुए हैं।
इस राजनीतिक घटनाक्रम के केंद्र में विधायक अनंत प्रताप देव के दो पुराने करीबी माने जाने वाले नेता दीपक प्रताप देव और ताहिर अंसारी हैं। दोनों झामुमो की राजनीति से जुड़े रहे हैं और क्षेत्र में विधायक की चुनावी जीत में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नेताओं के रूप में देखे जाते हैं।
दीपक प्रताप देव ने हाल ही में प्रेस वार्ता कर सार्वजनिक रूप से विधायक के खिलाफ नाराजगी जाहिर की है। दूसरी ओर ताहिर अंसारी ने अब तक खुलकर सार्वजनिक विरोध नहीं किया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में उन्हें भी विधायक से नाराज माना जा रहा है। हालांकि ताहिर अंसारी की ओर से इस संबंध में कोई सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है।
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा विवाद किसी वैचारिक मतभेद से अधिक राजनीतिक प्रभाव और सत्ता में भागीदारी को लेकर उपजा असंतोष है। क्षेत्र में चर्चा है कि चुनाव के दौरान सक्रिय भूमिका निभाने वाले कुछ नेताओं को उम्मीद थी कि विधायक बनने के बाद संगठन, क्षेत्रीय राजनीतिक फैसलों और सरकार से जुड़े मामलों में उनकी भूमिका अधिक प्रभावशाली होगी। लेकिन समय के साथ उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप राजनीतिक महत्व नहीं मिलने की भावना ने असंतोष को जन्म दिया।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि मौजूदा विवाद को “पावर शेयरिंग” के नजरिए से भी देखा जा रहा है। चर्चा है कि विधायक के करीबी रहे नेताओं और विधायक के बीच राजनीतिक भूमिका तथा प्रभाव क्षेत्र को लेकर मतभेद बढ़े हैं। वहीं विधायक अनंत प्रताप देव अपने राजनीतिक निर्णय स्वतंत्र रूप से लेते हुए दिखाई देते हैं। इसी कारण राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि अपेक्षित राजनीतिक भागीदारी नहीं मिलने से असंतोष गहराया है।
हालांकि, सत्ता में भागीदारी को लेकर चल रही इन चर्चाओं की किसी भी संबंधित पक्ष ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। इसलिए इन्हें स्थानीय राजनीतिक विश्लेषण और क्षेत्रीय चर्चाओं के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए झामुमो के भीतर चल रही यह खींचतान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि पार्टी नेतृत्व समय रहते इन मतभेदों को दूर नहीं कर पाया, तो इसका असर संगठनात्मक मजबूती और चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है। वहीं इन मतभेदों का समाधान होने की स्थिति में पार्टी एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतर सकती है।











