Location: Garhwa
भवनाथपुर की राजनीति इस समय तीखी जुबानी जंग के दौर से गुजर रही है। झारखंड के सत्तारूढ़ दल झामुमो के विधायक अनंत प्रताप देव और भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष व पूर्व विधायक भानु प्रताप शाही लगातार एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं। लेकिन इन राजनीतिक गर्मागर्म बयानों के बीच जनता के असली सवाल अनसुने ही रह जाते हैं।
पूर्व विधायक भानु प्रताप शाही ने आरोप लगाया है कि अनंत प्रताप देव के एक वर्ष के कार्यकाल में विकास पूरी तरह ठप है। उनके अनुसार प्रखंड और अंचल कार्यालयों में लूट का माहौल है, मनरेगा का काम नहीं चल रहा और क्षेत्र में अवैध बालू खनन तेजी से बढ़ा है। इतना ही नहीं, वे यह भी कहते हैं कि विधायक की अनुशंसाओं को अधिकारी खुलकर नजरअंदाज कर देते हैं। ये सभी आरोप गंभीर हैं, लेकिन सवाल यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भानु प्रताप शाही ने खुद 15 साल विधायक रहते हुए ऐसी स्थिति को क्यों नहीं सुधारा? और अब जब वे चुनाव हार चुके हैं, तो उनकी यह लगातार बयानबाज़ी कहीं चुनावी हार की छटपटाहट का परिणाम तो नहीं?
दूसरी ओर अनंत प्रताप देव भानु की आलोचना को खारिज करते हुए कहते हैं कि भानु प्रताप शाही के लंबे कार्यकाल में कई बड़े वादे अधूरे रह गए। क्रशर प्लांट की नीलामी, सीमेंट फैक्ट्री का न खुलना, माइंस बंद होना, और भवनाथपुर को अनुमंडल तथा नगर ऊंटरी को जिला बनाने जैसे दावे—इन सबका ठोस परिणाम नहीं निकला। अनंत का तर्क है कि आज भानु केवल बयान देकर राजनीतिक अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रहे हैं। पर यह भी साफ है कि एक वर्ष बीत जाने के बाद अनंत प्रताप देव के कार्यकाल में भी जनता किसी बड़े बदलाव को महसूस नहीं कर पाई है। सत्ताधारी दल के विधायक के रूप में क्षेत्र के विकास की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर है।
स्थिति यह है कि दोनों नेता एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं, लेकिन जनता की समस्याएँ वहीं खड़ी हैं—मनरेगा धीमा, प्रशासनिक उदासीनता, अवैध खनन और विकास की सुस्त रफ्तार। भानु प्रताप शाही भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं और विपक्ष की प्रभावी भूमिका निभाना उनकी जिम्मेदारी है। केवल बयान देना पर्याप्त नहीं, संघर्ष चाहिए। वहीं अनंत प्रताप देव सत्ताधारी दल के विधायक हैं और जनता उनसे नतीजे चाहती है, बहाने नहीं।
भवनाथपुर में आज सबसे अधिक जरूरत इस बात की है कि सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी–अपनी जिम्मेदारी समझें। बयानबाज़ी से न क्षेत्र बदलेगा, न जनता को राहत मिलेगी।
भवनाथपुर को अब बहस नहीं, काम चाहिए।











