Location: पटना
बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 के दूसरे चरण का प्रचार थम चुका है। अब 20 जिलों की 122 सीटों पर 11 नवंबर को मतदान होना है। प्रचार बंद होते ही सियासत का शोर थम गया, लेकिन अंदरूनी हलचल जारी है। एनडीए और महागठबंधन, दोनों खेमों में बेचैनी है। चुनावी हवा शांत दिखती है, पर भीतर हल्की उथल-पुथल है।
इस चुनाव में पारंपरिक दो ध्रुवों — एनडीए और महागठबंधन — के बीच तीसरा नाम भी चर्चा में है: प्रसांत किशोर की जनसुराज पार्टी। पिछले दो वर्षों से गांव-गांव घूमते हुए पीके ने जो सामाजिक संवाद बनाया है, उसने बिहार की राजनीति में नई बहस जोड़ी है। लेकिन ज़मीन पर संगठन और संसाधन सीमित हैं, इसलिए फिलहाल जनसुराज को “तीसरी ताकत” से अधिक “प्रभाव डालने वाला तत्व” माना जा रहा है।
जंगल राज का नैरेटिव और उसका असर
बिहार की राजनीति में “जंगल राज” शब्द अब भी एक प्रभावशाली हथियार है। भाजपा और जद(यू) हर चुनाव में इसे महागठबंधन, खासकर राजद के अतीत से जोड़कर सामने रखते हैं। एनडीए का पूरा प्रचार इस बार भी इसी धारणा पर आधारित रहा कि “राज्य को दोबारा अव्यवस्था में नहीं लौटने देना है।”
नीतीश कुमार और भाजपा दोनों ने यह संदेश बार-बार दोहराया कि राजद की सरकार लौटने का मतलब होगा पुराने दौर की वापसी — जब कानून-व्यवस्था बिगड़ी थी और उद्योग ठप पड़े थे। यह नैरेटिव अब भी ग्रामीण मतदाताओं के एक हिस्से में असरदार है, खासकर बुजुर्ग और व्यापारी वर्ग में।
हालांकि, युवा मतदाताओं में “जंगल राज” का डर उतना गहरा नहीं है। 20–25 साल की उम्र के वोटर उस दौर को खुद नहीं देख पाए। उनके लिए मुद्दे अब रोजगार, शिक्षा और प्रवासन हैं। यही वह वर्ग है जिसे तेजस्वी यादव और प्रसांत किशोर, दोनों टारगेट कर रहे हैं।
OBC फैक्टर: चुनाव की असली धुरी
बिहार की सामाजिक रचना में OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) और EBC (अति पिछड़ा वर्ग) की भूमिका निर्णायक है। मिलाकर ये दोनों समूह राज्य के लगभग 60–65 प्रतिशत मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। नीतीश कुमार ने 20 साल की राजनीति इसी वर्ग की सामाजिक इंजीनियरिंग पर खड़ी की। ईबीसी को अलग पहचान देकर उन्होंने 2005 में जो आधार बनाया, वही आज भी जद(यू) का सबसे स्थायी वोट बैंक है।
लेकिन इस बार समीकरण कुछ ढीले हैं। ईबीसी और ओबीसी के भीतर आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी और प्रवासन की समस्या ने नाराज़गी पैदा की है। कई सीटों पर यह वर्ग अब खुलकर किसी एक दल के साथ नहीं है। यही कारण है कि इस चुनाव में जाति के साथ विकास का सवाल भी उतनी ही अहमियत रखता है।
महागठबंधन की ओर से तेजस्वी यादव ने कोशिश की है कि यादवों के अलावा गैर-यादव OBC को भी जोड़ा जाए। उन्होंने रोज़गार, शिक्षा और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया है, लेकिन जातीय सीमाएँ अब भी दिखती हैं। वहीं भाजपा ने कुशवाहा, ईबिसि पासवान और बनिया वर्ग में अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश की है।
प्रसांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने इसी वर्ग को सबसे अधिक टारगेट किया है। वह खुद को “जाति से ऊपर विकास की राजनीति” का विकल्प बताते हैं। उनके प्रभाव वाले इलाकों — पश्चिम चंपारण, सीवान, गोपालगंज और सारण — में ओबीसी वोटों का बिखराव दोनों गठबंधनों के लिए चुनौती बन सकता है।
एनडीए की स्थिति
एनडीए ने अपना प्रचार नीतीश कुमार के अनुभव और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पर केंद्रित रखा। भाजपा की रैलियों में भीड़ दिखी और जद(यू) ने अपनी “विकास यात्रा” का हवाला दिया। ओपिनियन पोल्स में एनडीए को 140–160 सीटों के बीच बताया जा रहा है। लेकिन सत्ता विरोधी लहर पूरी तरह अनुपस्थित भी नहीं है। खासकर शहरी युवाओं और प्रवासी परिवारों में सरकार से नाराज़गी झलकती है।
नीतीश कुमार की शासन के लंबे कार्यकाल के कारण “थकान फैक्टर” भी दिखता है। इसके बावजूद एनडीए के पास संगठित ढांचा, संसाधन और प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रीय अपील , जैसी ताकतें हैं, जो अभी भी उसे बढ़त में रखती हैं।
महागठबंधन की कठिन लड़ाई
महागठबंधन के लिए इस चुनाव की राह आसान नहीं है। तेजस्वी यादव ने अपने अभियान को आक्रामक रखा, लेकिन उनके समर्थन का दायरा सीमित है। कांग्रेस कमज़ोर है और वामदलों की पकड़ कुछ इलाकों तक सीमित। विपक्ष ने “महंगाई और बेरोज़गारी” को मुख्य मुद्दा बनाया, लेकिन एनडीए के “जंगल राज” नैरेटिव ने उसके संदेश को कमजोर किया।
राजद की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यादव-मुस्लिम वोट के अलावा वह किन वर्गों को साथ रख पाएगा। गैर-यादव OBC में उसका प्रभाव घटा है, जबकि ईबीसी मतदाता नीतीश कुमार के साथ बने हुए हैं।
जनसुराज की सीमित पर असरदार उपस्थिति
प्रसांत किशोर की जनसुराज पार्टी अभी सत्ता की दौड़ में नहीं है, परंतु कुछ सीटों पर उसकी मौजूदगी निर्णायक हो सकती है। ओपिनियन पोल्स उसे 2–5 सीटों तक दे रहे हैं और करीब 6–7 प्रतिशत वोट शेयर का अनुमान है। यह वोट काटने वाला तत्व महागठबंधन के लिए ज़्यादा खतरनाक है, क्योंकि उसका असर राजद के मजबूत इलाकों में दिखाई दे रहा है।
समग्र तस्वीर
चुनाव 2025 किसी एक लहर का नहीं है। यह सीट-दर-सीट लड़ाई है, जहाँ OBC और युवा मतदाता निर्णायक होंगे। एनडीए अभी भी आगे है, पर उसकी बढ़त सुरक्षित नहीं मानी जा सकती। महागठबंधन को 110 के पार पहुंचना मुश्किल लग रहा है, जबकि जनसुराज सीमित है पर वोटों की दिशा बदल सकती है।
“जंगल राज” का नैरेटिव अब भी एनडीए के लिए राजनीतिक ढाल है, लेकिन इसके सामने “रोज़गार और परिवर्तन” की भाषा धीरे-धीरे नई राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है।
अंततः यह चुनाव सत्ता के पुनरावृत्ति या परिवर्तन का निर्णय ही नहीं लेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि बिहार की राजनीति अब भी अतीत के डर पर टिकी रहेगी या भविष्य की उम्मीद पर आगे बढ़ेगी।











