Location: Garhwa
गढ़वा जिले में अवैध बालू उत्खनन और परिवहन कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह से सदर अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीएम) संजय कुमार द्वारा लगातार रात में छापेमारी कर ट्रैक्टर जब्त किए गए हैं, उसने पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह नहीं है कि अवैध बालू कारोबार है या नहीं—सवाल यह है कि इसे रोकने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है और कौन इस जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभा रहा है।
बीते दिनों एसडीएम संजय कुमार ने न सिर्फ देर रात गश्ती कर अवैध बालू परिवहन में संलिप्त ट्रैक्टरों को पकड़ा, बल्कि एक ही रजिस्ट्रेशन नंबर पर चल रहे दो ट्रैक्टरों का खुलासा कर संगठित बालू माफिया नेटवर्क की ओर भी इशारा किया। इसके बाद आधी रात से लेकर तड़के तक चले अभियान में कोयल और दानरो नदी क्षेत्र से कुल सात ट्रैक्टरों की जब्ती ने यह स्पष्ट कर दिया कि अवैध बालू कारोबार खुलेआम, बेखौफ और सुनियोजित तरीके से चल रहा है।
यहां सबसे बड़ा सवाल पुलिस की भूमिका को लेकर खड़ा होता है। यदि एसडीएम अकेले रात 10:30 बजे से 1:30 बजे तक सड़क पर उतरकर ट्रैक्टर पकड़ सकते हैं, तो क्या यह मान लिया जाए कि पुलिस को इस अवैध कारोबार की कोई जानकारी नहीं थी? या फिर जानकारी होने के बावजूद आंखें मूंद ली गई थीं?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा अब तेज हो चुकी है कि बालू माफिया बिना किसी संरक्षण के इतना बड़ा नेटवर्क नहीं चला सकता। खबर यहां तक है कि पुलिस विभाग के भीतर से ही अवैध बालू कारोबारियों को अप्रत्यक्ष “परमिट” या संरक्षण मिल रहा है। यदि यह सच है, तो यह न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल है, बल्कि पूरे सिस्टम की साख पर सीधा प्रहार है।
एसडीएम की कार्रवाई के दौरान एक कथित मुखबिर का पकड़ा जाना और उसका बालू कारोबार से जुड़े लोगों से संबंध सामने आना, यह दर्शाता है कि माफिया सिर्फ ट्रैक्टर नहीं चलाता, बल्कि रेकी, सूचना तंत्र और राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव का भी इस्तेमाल करता है। इसके बावजूद जब कार्रवाई होती है, तो पैरवी के फोन आने लगते हैं—लेकिन एसडीएम द्वारा किसी की न सुनना यह दिखाता है कि प्रशासन में अब भी कुछ अधिकारी कानून को सर्वोपरि मान रहे हैं।
मगर बड़ा प्रश्न यही है—क्या सिर्फ एसडीएम के भरोसे बालू माफिया पर लगाम लगाई जा सकती है? जब तक पुलिस, खनन विभाग और जिला प्रशासन एकजुट होकर ईमानदारी से कार्रवाई नहीं करेंगे, तब तक ऐसी छापेमारी केवल अस्थायी डर पैदा करेगी, स्थायी समाधान नहीं।
अवैध बालू उत्खनन न केवल सरकारी राजस्व की चोरी है, बल्कि यह कानून-व्यवस्था, पर्यावरण और आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा है। देर रात तेज रफ्तार ट्रैक्टरों से होने वाली दुर्घटनाएं इसकी गवाही पहले ही दे चुकी हैं।
आज गढ़वा में हालात ऐसे दिख रहे हैं मानो एक तरफ एसडीएम संजय कुमार जैसे अधिकारी अकेले मोर्चा संभाले हुए हैं, और दूसरी तरफ सिस्टम का एक हिस्सा या तो निष्क्रिय है या संदिग्ध। यदि जिला प्रशासन वास्तव में अवैध बालू कारोबार पर रोक लगाना चाहता है, तो पुलिस की भूमिका की निष्पक्ष जांच, जवाबदेही तय करना और संरक्षण देने वालों पर सख्त कार्रवाई अनिवार्य होगी।
अन्यथा सवाल यही रहेगा—
जब रखवाले ही संदिग्ध हों, तो बालू माफिया पर लगाम आखिर कैसे लगेगी?











