Location: Meral
मेराल, गढ़वा:
एक ओर सरकार आदिवासी समाज के संरक्षण और उनके अधिकारों की बातें करती है, वहीं जमीनी हकीकत इससे एकदम उलट नजर आ रही है। थाना क्षेत्र के बहेरवा गांव में बीती रात हाथियों के झुंड ने एक 25 वर्षीय युवक रमेश परहीया को कुचलकर मौत के घाट उतार दिया। रमेश एक आदिम जनजाति ‘परहीया’ समुदाय से था, जो पहले ही विलुप्ति की कगार पर है। इस घटना ने न केवल प्रशासन की लापरवाही को उजागर किया है, बल्कि आदिवासी सुरक्षा को लेकर सरकार की कथनी और करनी में फर्क को भी बेनकाब किया है।
डेढ़ किलोमीटर दूर घर से पहले ही निगल गई जंगल की अंधेरी साजिश
रमेश बाजार से लौटते वक्त जंगल के पथरीले रास्ते से गुजर रहा था, जब अंधेरे में हाथियों के झुंड ने अचानक हमला कर दिया। महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित उसका घर अब हमेशा के लिए दूर हो गया। स्थानीय लोगों ने किसी तरह उसके घरवालों को सूचना दी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
परिवार में कोहराम, प्रशासन गायब
घटना के बाद परिजन घटनास्थल पर पहुंचकर दहाड़ें मार-मारकर रोते रहे, लेकिन प्रशासन अब तक लापता है। खबर लिखे जाने तक ना तो वन विभाग का कोई अधिकारी मौके पर पहुंचा, ना ही प्रशासनिक अमला। मृतक का शव घंटों तक घटनास्थल पर पड़ा रहा — यह सवाल उठाता है कि आदिवासियों की जान की कीमत आखिर कितनी है?
पहले ही दी गई थी चेतावनी – अखबारों और चैनलों ने छापी थी खबरें
कुछ ही दिन पहले इसी इलाके में हाथियों के आतंक और आदिवासी समुदाय की सुरक्षा को लेकर भय की खबरें प्रमुख अखबारों और चैनलों में प्रकाशित हुई थीं। लेकिन अफसोस, न तो वन विभाग जागा, न ही जिला प्रशासन। और आज, उसी लापरवाही की कीमत एक निर्दोष जान ने चुका दी।
क्या आदिवासी सिर्फ कागजों पर ज़िंदा हैं?
सरकार बार-बार ‘जनजातीय उत्थान’, ‘वनाधिकार’, और ‘सुरक्षा’ की बातें करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में आदिवासी समुदाय खुद को अकेला और असहाय पा रहा है। रमेश की मौत सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, यह प्रशासनिक हत्या है।
स्थानीय प्रतिनिधि पहुंचे, लेकिन प्रशासन अब भी मौन
सुबह मुखिया प्रतिनिधि जगजीवन रवि जिप सदस्य प्रतिनिधि करीब अंसारी घटनास्थल पर पहुंचे और पीड़ित परिवार को ढांढस बंधाया, साथ ही सरकारी मुआवजा दिलाने का आश्वासन भी दिया। लेकिन सवाल ये है कि जब मौत टल सकती थी, तो प्रशासन सोया क्यों रहा?
🔴 मांगें उठ रहीं हैं:
- रमेश परहीया की मौत को मुआवजा नहीं, न्याय चाहिए।
- वन विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
- हाथी प्रभावित इलाकों में तत्काल निगरानी और चेतावनी व्यवस्था लागू हो।
- आदिम जनजातियों के लिए विशेष सुरक्षा योजना बने और लागू हो।











