इस बार भाजपा में ‘लक्ष्मी की कृपा’ से टिकट मिलने की उम्मीद नहीं, थैलीशाहों को हो सकती है निराशा

Location: रांची

रांची: चुनाव में टिकट बंटवारे के बाद अक्सर विरोध और विद्रोह की खबरें आती हैं। इस मामले में सभी राजनीतिक दलों की लगभग एक जैसी स्थिति होती है। टिकट बंटवारे के बाद यह चर्चा भी आम रहती है कि पैसे पर टिकट बिक गया। अमुक व्यक्ति ने पैसे पर टिकट खरीद लिया। कार्यकर्ता और नेता देखते रह गए। फलाने नेता को इतना पैसा दिया और टिकट लेकर आ गया। टिकट को लेकर अब तो करोड़ों के लेनदेन की चर्चा होती है। हम बात करेंगे झारखंड भाजपा की। विधानसभा चुनाव को लेकर टिकट बंटवारे की प्रक्रिया शुरू हो गई है। टिकट बंटवारे में जिनकी भूमिका महत्वपूर्ण होने वाली है उनके दरवाजे पर भीड़ है। गणेश परिक्रमा हो रही है। एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति है। सबको टिकट चाहिए। राजनीति में यह स्वाभाविक भी है। सभी लोग झोला ढोने के लिए तो आए नहीं हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में कैसे टिकट बंटा? क्या हुआ? कौन पैसे से टिकट लिया और किसको बिना पैसा टिकट मिला। किसकी चली। कौन पीछे रह गया। इस पर चर्चा अब जरूरी नहीं। लेकिन इस बार स्थिति अलग है। ‘लक्ष्मी की कृपा’ से थैलीशाह को टिकट नहीं मिलेगा। उम्मीद है पैसे पर टिकट खरीद लेने की मंशा पाले नेताओं को निराशा हाथ लगेगी? टिकट बंटवारे में इस बार केंद्रीय स्तर पर तीन लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। चुनाव प्रभारी शिवराज सिंह चौहान, सह प्रभारी हिमंता विश्व सरमा और प्रभारी लक्ष्मीकांत दीक्षित। ये तीनों ऐसे नाम हैं जिनको पैसे से नहीं खरीदा जा सकता है और न प्रभावित किया जा सकता है। सीधे इन लोगों से लेनदेन की बात करने के बारे में कोई हिम्मत भी नहीं कर पाएगा। यदि करेगा तो परिणाम उल्टा हो सकता है। इसी से यह भरोसा होता है कि इस बार टिकट बंटवारे में पैसे व पहुंच का खेल नहीं चलेगा। पार्टी कार्यालय में चेहरा चमकाने वालों और नेताओं की परिक्रमा करने वालों को भी निराशा हाथ लगेगी। टिकट बंटवारे को लेकर तीनों प्रभारी रणनीति के तहत काम कर रहे हैं। कई स्तरों पर प्रत्याशियों के संबंध में जानकारी ली जा रही है। प्रदेश नेतृत्व से अलग भी ये तीनों जानकारी एकत्रित कर रहे हैं। सर्वे अपनी जगह पर है। व्यक्तिगत बातचीत में झारखंड के वरिष्ठ और प्रबुद्ध लोगों से भी ये नेता फीडबैक ले रहे हैं। एक-एक सीट पर तीनों की पैनी नजर है। संघ के लोगों से भी राय ली जा रही है। जीत हार का गणित और जातीय समीकरण पर भी नजर है। लगातार दौरे का उद्देश्य यही है कि जमीनी हकीकत से रूबरू हो सकें। प्रत्याशियों और क्षेत्रीय समीकरण की सही जानकारी मिल सके। कोई गुमराह न कर पाए। तीनों प्रभारी जिस तरह से मेहनत कर रहे हैं और फीडबैक ले रहे हैं, उससे संभावना है कि इस बार टिकट बंटवारे में बहुत गड़बड़ी नहीं होगी। जमीन से जुड़े नेताओं -कार्यकर्ताओं को मौका मिलेगा। टिकट वितरण से पहले पहली बार मंडल स्तर पर कार्यकर्ताओं की राय ली गई। वह भी वोटिंग के जरिए। इस प्रक्रिया ने कार्यकर्ताओं को उत्साहित किया है। उन्हें लगा कि उम्मीदवार चयन में उनकी राय भी ली गई। यदि 90% भी सही लोगों को टिकट मिल गया तो इसका परिणाम देखने को मिलेगा। दावे के साथ तो कोई यह नहीं कह सकता कि शत प्रतिशत सही लोगों को टिकट मिल ही जाएगा। क्योंकि राजनीति में यह संभव भी नहीं हो पाता है। अंतिम समय में कई फैक्टर सामने आ जाते हैं। कुछ बड़े नेताओं के कृपा पात्र से भी टिकट ले लेते हैं और यह सभी दलों में होता है। प्रदेश नेतृत्व के स्तर पर संभव है कि 2-4 टिकट इधर-उधर हो जाए। लेकिन बहुत गुंजाइश नहीं है। इसलिए इस बार थैलीशाह यदि यह सपना पाले हुए हैं कि वह पैसे के बल टिकट ले लेंगे तो उनका सपना पूरा होने वाला नहीं है। मेरी राय है कि यदि 90% भी सही लोगों को टिकट मिल गया तो कमल खिल सकता है। वैसे यह भी सत्य है कि राजनीति में अंतिम रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है। इस बार लड़ाई कठिन है।

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Sunil Singh

Sunil Singh is Reporter at Aapki khabar from Ranchi, Jharkhand.

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