हाथियों द्वारा घर तोड़े जाने के एक साल बाद भी 17 कोरवा-परहिया परिवार बेघर

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मेराल। प्रखंड के बहेरवा गाँव के आदिम जनजाति कोरवा परहिया परिवार के लोगों का पिछले एक वर्ष पहले हाथियों द्वारा मकान क्षतिग्रस्त कर दिए जाने के कारण लोग रहने के लिए दर-दर भटकते चल रहे हैं जिला प्रशासन एक साल बीत जाने के बाद भी उन लोगों का सुध लेने नहीं पहुंची। यहां तक की किसी प्रकार के जनप्रतिनिधि लोग भी 1 साल के दौरान कोई भी उनके समस्याओं को जानने के लिए नहीं पहुंचे। बहेरवा गाँव,के पहाड़ पर बस्ती है वहां पर 17 घरों के परिवार का सदस्य रहते थे जिनकी संख्या 71 लोगों का है हाथी द्वारा सभी घरों को तोड़ दिए जाने के कारण कुछ दिनों तक बानाजांघ, स्कूल में रहते थे लेकिन फिर स्कूल से इन लोगों को हटा दिया गया इसके बाद गेरुआ सोती में वन विभाग के जमीन पर सात झोपड़ी बनाकर 17 परिवार के लोग गुजर बसर करते हैं। अभी फिलहाल स्थिति यह है कि 71 सदस्यों में तीन व्यक्ति सभी परिवार के लोगों का गाय बैल और बकरी लेकर बहेरवा पहाड़ पर ही रहते हैं। दिन भर गाय बैल बकरी चराने के बाद शाम में स्कूल के छत पर तीनों लोग रात गुजारते हैं। रात्रि में बारिश होने पर प्लास्टिक ओढ़ कर बैठे रहते हैं खाना तीनो लोग दिन में बनाकर खा लेते हैं जब हाथी आने की भनक लगता हैं तो इन लोगों ने अपने गाय बैल और बकरी को खोलकर छोड़ देते हैं और छत पर चढ़कर बैठ जाते हैं वहां से 4 किलोमीटर की दूरी पर उनके परिवार के लोग सात झोपड़ी बनाकर 69 सदस्य रहते हैं। उन्हीं सदस्य में से जगदीश परहिया अपना दुखड़ा सुनाते हुए बताया कि राशन के चावल गेहूं और नमक मिलता है नमक और रोटी खाकर हम लोग रह जाते हैं कभी-कभी कहीं गांव में कोई काम मिल जाता है तो करते हैं नई काम मिलने पर बैठ के यही झोपडी और पेड़ तर दिन गुजारते हैं उन्होंने बताया कि हम लोगों को कई माह से पेंशन भी नहीं मिल रहा है जिससे कि अपना आवश्यकता के सामान ले सकें। इस वर्ष हम लोग बहेरवा, पहाड़ पर थोड़ा सा खेती किए थे जो सभी हाथियों के द्वारा बर्बाद कर दिया गया उसने बताया कि मजदूरी के लिए भी कहीं काम नहीं मिल पाता है जिसके कारण हम लोगों को जीवन यापन में काफी कठिनाई हो रही है उसने बताया कि पहाड़ पर गाय बैल और बकरी लेकर मेरे परिवार के फज़ीहत, कोरवा बिरझु कोरवा और नारायण कोरवा तीनों लोग रहते हैं। सुनील परहिया ने बताया कि रात्रि में जब बारिश होने लगता है तो हम लोग सभी लोग झोपडी में बैठकर रात किसी तरह गुजारते हैं।साथ ही वज्रपात की गर्जन से काफी डरा सहमा समय होता है।

शिव रतन परहिया ने बताया कि यहां पर पानी पीने के लिए हम लोगों को कोई व्यवस्था नहीं है इसी जगह पर एक छोटा सा नाला है उसी में एक चुवाड़ी खोदकर, पानी पीते हैं बारिश होने पर बारिश के पानी से भर जाता है तो गंदा पानी लाल रंग का हो जाता है मजबूरी उसी पानी को हम लोग पीते हैं।

स्कूल में पढ़ने वाला छात्रा सोनी कुमारी और छात्र अनंत परहिया ने बताया कि जब से मेरे मां बाप लोग इस वन विभाग के जमीन में झोपड़ी बना कर रह रहे हैं तब से लगभग 1 साल बीत गया हम लोग का स्कूल की पढ़ाई बंद है हम लोगों का स्कूल लगभग 4 किलोमीटर यहां से दूर पड़ता है जिसके कारण स्कूल भी नहीं जाते हैं हाथी के डर के कारण हम लोग स्कूल जाना बंद कर दिए हैं जिसके कारण पढ़ाई भी बाधित है बच्चों ने बताया कि पहाड़ पर भी हम लोग अपना स्कूल जाते थे तो कभी ढंग का भोजन नहीं मिलता था फल और अंडा तो कभी मिला ही नहीं है। एक साल से काफी दूर होने के कारण हम लोग अपने घर पर ही रहते हैं।

अशोका देवी, संगीता देवी चिंता देवी लालती देवी राजकुमारी देवी गीता देवी ने अपने समस्याओं को सुनाते हुए कहा कि हम लोग वन विभाग के भूमि पर झोपड़ी बनाकर रहते हैं लेकिन कभी-कभी वन विभाग के पदाधिकारी आते हैं और बोलते हैं कि यहां पर किसी प्रकार का घर नहीं बनाना है दूसरे जगह आप लोग चले जाइए यहां हम नहीं रहने देंगे। उन लोगों ने बताया कि हम लोग जबरन यहां रहते हैं हम लोगों को सरकार कहीं जमीन उपलब्ध करा देती तो अपना मकान बनाकर रहने लगते यहां इतना समस्या है कि आसपास में कहीं किसी तरह का चापाकल या कुआं नहीं है जिससे कि हम लोग पानी ला सके मजबूरी में नाला में एक गड्ढा खोदकर पानी पीते हैं कभी-कभी हम लोगों को काम मिलता है बाकी दिन घर पर ही रहते हैं किसी तरह से भोजन राशन के सहारे चल रहा है। इन लोगों ने बताया कि आंगनबाड़ी से जो सुविधा मिलता है वह भी अभी कई महीनो से बंद है।

शिव रतन परहिया ने बताया कि हम लोग 17 घरों के परिवार यहां पर रहते हैं उन्होंने वन विभाग के भूमि पर रहने वाले सदस्यों में जगदीश परहिया राजेंद्र परहिया विनोद परहिया पप्पू परहिया नंदू परहिया, प्रेम परहिया धनंजय परहिया सुरेश परहिया उमेश परहिया, रमेश परहिया दिनेश परहिया नारायण परहिया बिरजू परहिया, प्रमोद परहिया, अखिलेश परहिया और फजीहत परहिया है। इन सभी लोगों के परिवार की सदस्यों की संख्या 71 व्यक्ति हैं उन्होंने जिला प्रशासन से मांग किया कि हम लोगों को कहीं पर जमीन उपलब्ध कर दिया जाता तो अपना अपना मकान बनाकर हम लोग रहने लगते जिससे हम लोगों की समस्या खत्म हो जाता लेकिन बड़े दुख से कहना पड़ रहा है कि 1 साल बीत जाने के बाद भी हम लोगों के पास कोई पदाधिकारी हमारी समस्याओं को सुनने के लिए नहीं पहुंचे।और अभी तक यहां के विधायक सांसद भी हम लोगों को तकलीफ जानने आए।

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  • Yaseen Ansari

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