Location: Garhwa
यद्यपि नगर निकाय चुनाव औपचारिक रूप से दलीय आधार पर नहीं लड़े जाने हैं, लेकिन गढ़वा नगर परिषद का चुनाव पूरी तरह राजनीतिक रणनीतियों के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। प्रमुख राजनीतिक दल अपने-अपने समर्थक उम्मीदवारों के सहारे इस गैर-दलीय चुनाव में भी अपनी सियासी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश में जुटे हैं।
गढ़वा नगर परिषद में छोटी-बड़ी कई राजनीतिक पार्टियां अपने समर्थित प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रही हैं, लेकिन मुख्य रस्साकशी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के बीच देखने को मिल रही है। दोनों दल इस चुनाव को न केवल प्रतिष्ठा का प्रश्न मान रहे हैं, बल्कि इसे आगामी राजनीतिक समीकरणों की तैयारी के रूप में भी देख रहे हैं।
इस बार दोनों प्रमुख दलों की मुश्किल इसलिए भी बढ़ गई है कि नगर परिषद अध्यक्ष का पद पिछड़ा वर्ग महिला आरक्षण से मुक्त कर सामान्य वर्ग घोषित कर दिया गया है। आरक्षण की यह बाधा हटते ही अध्यक्ष पद के लिए दावेदारों की संख्या में अचानक उछाल आ गया है, जिससे प्रत्याशियों की मानो बाढ़-सी आ गई है। परिणामस्वरूप राजनीतिक दलों के भीतर ही प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है।
भाजपा खेमे में कंचन जायसवाल, सुरेंद्र विश्वकर्मा, अनिल पांडेय समेत कई नेता और कार्यकर्ता अध्यक्ष पद की तैयारी में जुटे हैं। सभी अपने-अपने सामाजिक आधार, संगठनात्मक पकड़ और जनसंपर्क के दम पर खुद को मजबूत दावेदार के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के लिए किसी एक नाम पर सहमति बनाना और अप्रत्यक्ष समर्थन देना आसान नहीं दिख रहा।
झामुमो की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। पार्टी से जुड़े संतोष केसरी, कंचन साहु, अनिता दत्त, मासूम खान सहित लगभग आधा दर्जन से अधिक नेता चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। आरक्षण हटने से झामुमो में भी नए और पुराने दावेदारों के बीच समीकरण लगातार बदलते नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गैर-दलीय स्वरूप के बावजूद यह चुनाव दलों के लिए आंतरिक शक्ति परीक्षण बन चुका है। जो उम्मीदवार बेहतर संगठनात्मक समर्थन, सामाजिक संतुलन और जनस्वीकार्यता साबित करेगा, वही अंततः पार्टी के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है।
कुल मिलाकर गढ़वा नगर परिषद चुनाव इस बार विकास के मुद्दों के साथ-साथ राजनीतिक संतुलन, नेतृत्व की स्वीकार्यता और भविष्य की रणनीति तय करने का महत्वपूर्ण मंच बनता जा रहा है। अब देखना यह होगा कि दावेदारों की इस भीड़ में कौन सा चेहरा जनता का विश्वास जीत पाता है और किस दल की रणनीति सबसे अधिक कारगर साबित होती है।











