Location: Garhwa

दासी मंथरा और माता कैकई तो एक माध्यम बनी थी : विनोद पाठक
गढ़वा : प्रभु श्रीराम को राज्याभिषेक की बजाय वन में भेजना यह देवताओं की इच्छा थी. देवताओं की प्रार्थना पर मां सरस्वती ने पहले मंथरा और फिर कैकई की मति फेरकर श्रीराम की जगह भरत का राज्याभिषेक व श्रीराम को वनवास भेजने के लिये राजा दशरथ को बिवश किया था. कैकई और मंथरा तो श्रीराम वनवास के लिये मात्र माध्यम बनी थी. यह बात गायत्री परिवार के विनोद पाठक ने कही. वे गायत्री शक्तिपीठ कल्याणपुर में शारदीय नवरात्रि के अवसर पर आयोजित श्रीराम कथा के आठवें दिन प्रवचन कर रहे थे. उन्होंने कहा कि श्रीराम के राज्याभिषेक होने की जानकारी से जहां अयोध्या के सभी नगरवासी खुशी मना रहे थे, वहीं सभी देवता इस खबर से दुखी हो गये थे. तब उन्होंने मां सरस्वती से प्रार्थना कर किसी तरह से इस राज्याभिषेक को टालने और श्रीराम के वन भेजने का उपाय करने को कहा था. रामचरित मानस में तुलसीदास ने लिखा है, जब सारे देवता मां सरस्वती से इस दोहे के माध्यम से विनती कर रहे हैं- बिपति हमारी बिलोकि बड़ि मातु करिअ सो आजु, रामु जाहिं बन राजु तजि होई सकल सुर काजु. उन्होंने कहा कि इस प्रकार देवताओं के कारण ही माता कैकई खलनायक बन गई. देवताओं ने मां सरस्वती से कहा था कि यदि प्रभु श्रीराम अयोध्या की गद्दी पर बैठकर राजकाज संभालने में लग जायेंगे, तो उनके अवतार का उद्देश्य कैसे पूरा होगा. देवताओं ने कहा कि श्रीराम का अवतार उनकी सामूहिक प्रार्थना के परिणामस्वरूप रावण सहित सभी असुरों का संहार कर धरती का भार उतारने के लिये हुआ है. इसलिये श्रीराम के राज्याभिषेक को रोकना ही देव कार्य है. सोमवार की शाम श्री पाठक ने श्रीराम के वन गमन से लेकर उनके प्रयाग राज और चित्रकूट तक पहुंचने की कथा सुनायी. उन्होंने कहा कि श्रीराम के अयोध्या छोड़कर वनवास के लिये जाने का जो प्रसंग है, वह परिवार के त्याग और एक-दूसरे के प्रति स्नेह की भावना का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. प्रभु श्रीराम को जैसे ही अपने सौतेली माता कैकई से पिता के दिये हुये वचन की जानकारी मिलती है, उन्हें पिता के आज्ञा का पालन करने के लिये अयोध्या जैसे विशाल राज्य को त्याग करने में क्षण भर भी देर नहीं लगती है और वनवास के लिये तैयार हो जाते हैं. साथ ही राम के साथ उनकी पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी उनकी सेवा के लिये वन में जाने के लिये तैयार हो जाते हैं. चुकि यह राजा दशरथ के वचन को पूरा करने की बात थी, इसलिये कहीं से कोई विरोध के स्वर नहीं उठे और सबकुछ एक सामान्य घटना की तरह घटित हो गया. राम का चरित्र हमारे लिये आदर्श है. प्रभु राम के वन गमन का दृश्य हमें शिक्षा देता है कि किसी भी परिवार की नींव सदस्यों के त्याग, स्नेह और समर्पण पर टिकी होती है. श्री पाठक ने कहा कि हमारी संस्कृति में इतना सुंदर श्रीराम का चरित्र हमारे समक्ष है, बावजूद आज हमारा परिवार तेजी से बिखर रहा है. परिवार में कलह और संबंधों का विच्छेद होना आम बात हो गयी है. परिवार निर्माण के लिये हमें श्रीराम की कथा से प्रेरणा लेनी चाहिये. कथा के दौरान शिवपूजन व्यास ने सभी प्रसंगों पर भजन प्रस्तुत कर इसे और सरस और भावुक बनाने का काम किया. सह गायक उपेंद्र शर्मा, बैंजों पर रंजीत विश्वकर्मा, नाल पर राम सुंदर राम और झाल पर नंदू ठाकुर व अशोक विश्वकर्मा ने संगत किया. कथा का संचालन अखिलेश कुशवाहा ने किया. ट्रस्टी मिथिलेश कुशवाहा द्वारा कथा का लाइव प्रसारण किया गया.











