Location: पलामू

पलामू प्रमंडल। पलामू की एक पुरानी लोकोक्ति है—‘सावन से भादो दूबर’। यानी सावन से भादों मास बारिश के मामले में कमजोर नहीं है। इस बार भादो की शुरुआत ने इस कहावत को फिर जमीन पर उतार दिया है। अगस्त के आखिरी दो दिनों से शुरू हुई लगातार बारिश ने पलामू प्रमंडल के पलामू, गढ़वा और लातेहार जिलों में एक साथ असर दिखाया है। कहीं नदियां उफन रही हैं, कहीं खेतों में पानी भर गया है, कहीं सड़क और पुल-पुलिया प्रभावित हैं तो कई शहरी और ग्रामीण इलाकों में जलजमाव ने जनजीवन की रफ्तार रोक दी है।
पलामू में 31 अगस्त को डालटनगंज में 74.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। इससे पहले जून-जुलाई में औसत से कम बारिश के कारण खेती प्रभावित थी, लेकिन अगस्त में 308 मिलीमीटर बारिश दर्ज होने से धनरोपनी में तेजी आई और अगस्त के अंत तक जिले में धान की रोपनी करीब 72 प्रतिशत तक पहुंचने की रिपोर्ट है। यानी महीने के अंत में हुई बारिश किसानों के लिए राहत लेकर आई, लेकिन लगातार बारिश अब कई इलाकों में परेशानी का कारण बनने लगी है।
गढ़वा में लगातार बारिश के कारण कोयल नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ा है। मझिआंव में नदी का पानी किनारे के इलाकों तक पहुंच गया। निचले इलाकों में जलजमाव हुआ और कई जगह धान के खेत पानी में डूब गए। कांडी क्षेत्र में पंडी नदी के उफान के साथ सोन नदी के बढ़े जलस्तर का असर भी दिखाई दिया। नारायणपुर के पास दोनों नदियों के संगम पर पानी का दबाव बढ़ने से पंडी नदी का पानी तेजी से आगे नहीं निकल सका और पलटधारा के रूप में खेतों तथा गांवों की ओर फैल गया।
लातेहार में भी बारिश का असर सामान्य नहीं रहा। जिले के महुआडांड़ में पिछले 24 घंटे में 171 मिलीमीटर बारिश दर्ज होने की रिपोर्ट सामने आई है। यह आंकड़ा बताता है कि प्रमंडल के अलग-अलग हिस्सों में बारिश की तीव्रता एक जैसी नहीं रही, लेकिन कई स्थानों पर बारिश ने कम समय में बड़ी मात्रा में पानी जमीन पर उतार दिया।
बारिश का असर केवल नदी और खेत तक सीमित नहीं रहा। गढ़वा के रंका क्षेत्र में टुकवा नदी पर बना पुल बाढ़ के दबाव में क्षतिग्रस्त होकर ध्वस्त हो गया, जिससे आसपास के गांवों का संपर्क प्रभावित हुआ। दूसरी ओर मझिआंव, कांडी और अन्य इलाकों में सड़क, नाली और निचले हिस्सों में जलजमाव की समस्या सामने आई है।
बारिश बनी राहत भी, आफत भी
पलामू प्रमंडल में इस बारिश की कहानी एकतरफा नहीं है। जून-जुलाई में कम बारिश से परेशान किसानों के लिए अगस्त की बारिश राहत बनी। धान की रोपनी को पानी मिला और सूखे खेतों में हरियाली लौटी। लेकिन लगातार दो दिनों की तेज बारिश ने तस्वीर का दूसरा पक्ष भी सामने रख दिया है। जिन खेतों में पानी की जरूरत थी, वहां अब निकासी की चिंता है। नदी किनारे के खेतों में खड़ी फसल डूबने लगी है और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को घर और आवागमन की चिंता सताने लगी है।
यही पलामू की बारिश की विडंबना है। यहां बारिश कम हो तो खेती संकट में पड़ती है और बारिश एक साथ ज्यादा हो जाए तो खेत, सड़क और बस्तियां संकट में आ जाती हैं।
अभी बारिश से राहत की गारंटी नहीं
मौसम विभाग ने 1 सितंबर को झारखंड के कई जिलों में भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी जारी की थी। पलामू, गढ़वा और लातेहार भी प्रभावित जिलों में शामिल हैं। 2 सितंबर को भी झारखंड में बारिश की गतिविधि जारी रहने का पूर्वानुमान है। ऐसे में प्रमंडल के लिए अगले 24 से 48 घंटे महत्वपूर्ण हैं।
दो दिनों की बारिश ने फिलहाल इतना जरूर साबित कर दिया है कि पलामू में सावन की कमी भादो पूरा करने में जुटा है। लेकिन इस बार सवाल सिर्फ कहावत के चरितार्थ होने का नहीं है। सवाल यह है कि बारिश का पानी खेतों के लिए कितना जीवन देगा और बस्तियों के लिए कितना संकट पैदा करेगा। आने वाले एक-दो दिन इसका जवाब तय करेंगे।










