Location: रांची
रांची: बिहार में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। नवंबर में चुनाव की संभावना है। चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों द्वारा तानेबाने बुने जा रहे हैं। इस बीच जातीय उन्माद फैलाने की कोशिश शुरू हो गई है। यह कहां रुकेगी कहना मुश्किल है। राजनीतिक लाभ के लिए बिहार को फिर से जंगल राज की ओर धकेलना की कोशिश हो रही है। करीब तीन चार दशक पहले लालू यादव ने भूरा बाल साफ करो का नारा दिया था। तब पूरे देश में इसकी आलोचना हुई थी। आज की युवा पीढ़ी इस नारे को लगभग भूल गई है। लेकिन इतने दिनों बाद फिर से बिहार की राजनीति में यह नारा गूंजने लगा है । राजद के नेता अपनी सभाओं में भूरा बाल साफ करो का नारा दे रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से यह नारा बिहार में फिर से सुनाई पड़ रहा है। इससे भय का माहौल बन रहा है। अभी चुनाव में तीन-चार महीने की देरी है। ऐसा लगता है कि जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आएगी यह नारा और बुलंद होगा। राष्ट्रीय जनता दल के नेता बिहार में अगड़ा- पिछड़ा का खेल कर सत्ता हथियाना चाहते हैं। क्योंकि बिहार में अभी पिछड़ों के सबसे बड़े नेता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही हैं। यादवों को छोड़कर अधिकांश पिछड़ी जातियों का समर्थन नीतीश कुमार के साथ है। यदि यह साथ बना रहा तो तेजस्वी यादव का मुख्यमंत्री बनने का सपना पूरा नहीं होगा। संभव है इसीलिए एक बार फिर से बिहार में अगड़ा-पिछड़ा का नारा बुलंद किया जा रहा है। यह वोट का खेल है। लालू राबड़ी के शासन में भूरा बाल साफ करो के नारे की वजह से ही अनेकों नरसंहार हुए थे। यदि फिर से बिहार इसी रास्ते पर चलेगा तो परिणाम गंभीर होंगे। आज के युवा पीढ़ी को यह समझने की जरूरत है। चाहे वह किसी जाति या समुदाय के हो हो। बिहार जब विकास के रास्ते पर है तब इस तरह के नारे से बिहार और बिहारियों को नुकसान ही होगा।











