Location: Ranka
रंका (गढ़वा)। रंका में भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र की ऐतिहासिक रथयात्रा को लेकर सभी तैयारियाँ पूरी कर ली गई हैं। शुक्रवार की संध्या को राज पुरोहितों द्वारा पारंपरिक वैदिक विधि-विधान से भगवान के श्रीविग्रह को रथ पर विराजमान कर मौसीबाड़ी तक की यात्रा कराई जाएगी, जहाँ भगवान एक सप्ताह तक भक्तों को सुलभ दर्शन देंगे।
रंका ठाकुरबाड़ी के मुख्य द्वार पर तालध्वज, पद्मध्वज और नंदी घोष के संयुक्त स्वरूप वाले रथ को आकर्षक ढंग से सजाया गया है। गुरुवार को भगवान जगन्नाथ के कक्ष का पट खुलने के बाद मंदिर के प्रधान पुजारी पं. बालेश्वर दुबे द्वारा भगवान के श्रीविग्रह का विशेष श्रृंगार, नेत्रदान, पूजन और महाआरती की गई। इसके उपरांत षोडश नाम अखंड कीर्तन की शुरुआत की गई, जो शुक्रवार दोपहर बाद संपन्न होगी।
कीर्तन समाप्ति के पश्चात भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और भैया बलभद्र की विशेष पूजन कर महाप्रसाद भोग अर्पित किया जाएगा और महाआरती उतारी जाएगी। तत्पश्चात ठाकुर जी के चाँदी निर्मित श्रीविग्रह को नगर परिभ्रमण कराया जाएगा, जिसके बाद पुष्पवर्षा करते हुए तीनों देवताओं को रथ पर आरूढ़ कर मौसीबाड़ी तक रथयात्रा निकाली जाएगी।
क्या है इस रथयात्रा का महात्म्य?
ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी के रथ पर विराजमान स्वरूप के दर्शन करने और रथ खींचने वालों पर कभी कोई विपत्ति नहीं आती। इसी आस्था और रहस्य को जानकर भक्तगण रथ खींचने, छूने और इस अद्भुत दृश्य को अपनी आँखों से देखने को लेकर अत्यंत उत्साहित रहते हैं। रथयात्रा के पश्चात तीनों भगवान एक सप्ताह तक मौसीबाड़ी में विश्राम करते हैं, जहाँ प्रतिदिन श्रद्धालु दर्शन का लाभ लेते हैं। इस दौरान राज पुरोहित पं. भोलानाथ पांडेय शास्त्री द्वारा श्रीमद्भागवत महापुराण का सस्वर पाठ भगवान को अर्पित किया जाएगा।
रंका में रथयात्रा की शुरुआत कब हुई?
रंका में रथयात्रा की शुरुआत वर्ष 1865 ई. में हुई थी। तत्कालीन रंका नरेश कृष्णदयाल सिंह को जब वंश के उत्तराधिकारी की चिंता हुई, तो उन्होंने अपने विद्वानों से परामर्श कर नगर के पास एक बड़ा तालाब बनवाया, जिसे आज “बड़ा राजा तालाब” के नाम से जाना जाता है। इसके बाद एक विशाल बागीचा और पाँच शिखरों वाला भव्य ठाकुरबाड़ी मंदिर बनवाया गया, जो विक्रम संवत 1922 में बनकर तैयार हुआ। वैदिक विधि से अक्षय तृतीया के दिन भगवान के श्रीविग्रह की स्थापना की गई, जिनमें जगन्नाथ पुरी से लाए गए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएँ भी शामिल थीं। उसी वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथ पुरी की परंपरा के अनुसार रंका में रथयात्रा की शुरुआत हुई, जो आज भी पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाई जाती है।











