Location: Garhwa
मोकामा में जन सुराज पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ता दुलारचंद यादव की हत्या ने बिहार की चुनावी हवा को झकझोर दिया है। प्रचार के बीच गोलियों की गूंज और फिर निर्दयता से कुचलने की यह वारदात उस सच्चाई को फिर सामने ले आई है कि बिहार की राजनीति अब भी पूरी तरह हिंसा और बाहुबल के साये से मुक्त नहीं हुई है।
मोकामा कोई साधारण इलाका नहीं। यह बिहार की सत्ता की धड़कन रहा है—जहाँ जाति, अपराध और राजनीति की त्रिमूर्ति हमेशा से चुनावी गणित तय करती रही है। अनंत सिंह जैसे नाम यहाँ के राजनीतिक चरित्र का हिस्सा बन चुके हैं, और अब जन सुराज पार्टी के उभार ने इस समीकरण को नया मोड़ दे दिया है। दुलारचंद यादव की हत्या ने इस टकराव को और तेज़ कर दिया है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक उम्मीद की हत्या है जो बिहार में शांति और बदलाव की चाह लेकर उठी थी।
इस घटना का असर मोकामा की सीमाओं से बहुत आगे तक फैल गया है। बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में अचानक तनाव और संशय का माहौल है। चुनाव अब केवल विकास, गठबंधन या रोजगार के मुद्दों तक सीमित नहीं रह गया—उसके केंद्र में सुरक्षा, भय और बाहुबल की राजनीति फिर लौट आई है। नीतीश कुमार की सरकार पर कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठे हैं, वहीं प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को सहानुभूति की लहर मिलती दिखाई दे रही है। आरजेडी भी इस हिंसा से पूरी तरह बच नहीं पा रही, क्योंकि यह घटना उस दौर की याद दिला रही है जब “जंगल राज” बिहार की पहचान बन गया था।
मोकामा की गोली ने पूरे राज्य में पुराने जख्मों को कुरेद दिया है। जातीय तनाव की रेखाएँ फिर गहरी होती दिख रही हैं—यादव और भूमिहार समुदायों के बीच पुराना अविश्वास एक बार फिर उभर रहा है। यह स्थिति उस सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरे का संकेत है जो पिछले कुछ वर्षों में अपेक्षाकृत शांत हुआ था। चुनावी मैदान में इस भावनात्मक उबाल का सीधा असर मतदान के व्यवहार पर पड़ना तय है।
अब सवाल यह नहीं कि दोषी कौन है, बल्कि यह है कि क्या बिहार फिर उसी पुराने रास्ते पर लौट रहा है जहाँ लोकतंत्र का अर्थ दबंगों का जलवा और भय का वातावरण था। मोकामा की यह घटना इस बात की कसौटी बन चुकी है कि क्या राज्य की राजनीति सचमुच परिपक्व हुई है या अब भी वही पुराना ढर्रा कायम है।
यह हत्या बिहार के हर मतदाता के विवेक को झकझोरने वाली है। लोकतंत्र में बंदूकें नहीं, मतपत्र बोलते हैं। यदि जनता ने डर के बजाय सोच-समझकर वोट किया, तो मोकामा की गोली बिहार की सियासत में नया मोड़ बन सकती है। लेकिन अगर यह घटना केवल एक और ‘चुनावी हादसा’ बनकर रह गई, तो यह मान लेना होगा कि बिहार अब भी अपनी पुरानी परछाइयों से बाहर नहीं निकल पाया है।











