Location: Garhwa
गढ़वा, 29 सितंबर।
गढ़वा जिले में पिछले दो हफ्तों के भीतर पुलिस द्वारा अवैध महुआ शराब के खिलाफ चलाए गए सघन छापामारी अभियानों ने जिले में फैले इस अवैध कारोबार के विशाल नेटवर्क का पर्दाफाश कर दिया है। 10 सितंबर से 28 सितंबर तक चले इस अभियान में जिले के लगभग हर थाना क्षेत्र से भारी मात्रा में जावा महुआ, शराब बनाने के उपकरण, गैस सिलेंडर, भट्ठी और देशी चुलाई शराब बरामद की गई। कई जगहों पर जब्त सामानों को मौके पर ही विनष्ट कर दिया गया।
पुलिस की इन कार्रवाइयों ने जहां कानून-व्यवस्था को बनाए रखने की तत्परता को दिखाया, वहीं आबकारी विभाग की निष्क्रियता एक बड़े सवाल के रूप में सामने आई है। सवाल सिर्फ उनकी मौजूदगी का नहीं है, असल सवाल यह है कि आबकारी विभाग ने गढ़वा जिले में अपनी जिम्मेदारी आखिर निभाई क्यों नहीं। जिस तरह से अवैध शराब निर्माण गांव-गांव में फैला हुआ था, उससे यह स्पष्ट होता है कि विभाग ने लंबे समय तक न तो निगरानी की, न ही कोई ठोस कार्रवाई की।
छापामारी की घटनाएं केवल पुलिस द्वारा अंजाम दी गईं। किसी भी प्रेस विज्ञप्ति या अभियान में आबकारी विभाग की भागीदारी नहीं दिखी। यह उस स्थिति में है जब शराब निर्माण, बिक्री और भंडारण पर निगरानी रखने की कानूनी जिम्मेदारी सीधे तौर पर आबकारी विभाग की होती है। आबकारी विभाग की निष्क्रियता ने इस पूरे अवैध कारोबार को फैलने का अवसर दिया।
गढ़वा जैसे सीमावर्ती और आदिवासी बहुल जिले में महुआ शराब लंबे समय से परंपरागत रूप से बनाई जाती रही है, लेकिन हाल के दिनों में इसका व्यवसायिक तस्करी में बदल जाना, कानून व्यवस्था और जन स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरे की घंटी है। ऐसे में आबकारी विभाग की भूमिका और भी अहम हो जाती है, लेकिन यह विभाग पूरी तरह नदारद रहा।
सवाल यह भी उठता है कि क्या विभाग को जिले में चल रहे अवैध शराब धंधे की जानकारी नहीं थी? और अगर जानकारी थी तो उसने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? ऐसी स्थिति में विभाग की नाकामी महज प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि अपराधियों को बढ़ावा देने वाली चुप्पी मानी जाएगी।
पुलिस ने दुर्गा पूजा को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए यह अभियान चलाया, लेकिन भविष्य में इस तरह के अवैध कारोबार को रोकने के लिए सिर्फ पुलिस पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। आबकारी विभाग को अब जवाब देना होगा कि वह कहां है और क्या कर रहा है।












