गढ़वा की आस्था का अद्भुत दृश्य: मां गढ़ देवी की प्रतिमा श्रद्धालुओं के कंधों पर सवार होकर हुई विसर्जित

Location: Garhwa

यह परंपरा दशकों पुरानी है, जो गढ़वा की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का प्रतीक बन चुकी है। दशहरे के दिन दोपहर 3 बजे के बाद, जब पूरे शहर में दुर्गोत्सव की गूंज समाप्त होने को होती है, तब मां गढ़ देवी की प्रतिमा मंदिर परिसर से बाहर लाई जाती है। जैसे ही मां का आह्वान होता है, हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ मंदिर परिसर में उमड़ पड़ती है। हर चेहरा आस्था से भरा होता है, और हर आंख नम।

जैसे ही प्रतिमा को कंधे पर उठाया जाता है, एक अलौकिक शक्ति पूरे वातावरण में महसूस होती है। ढोल-नगाड़ों की गूंज, शंखनाद, जयकारों की गूंज और भक्तों की आंखों में बहते भावुक अश्रु—यह सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं जो शब्दों में बांधना कठिन है।

नगर में भ्रमण करते हुए जब मां की झांकी गुजरती है, तो हर गली, हर चौराहा, हर मकान से लोग अंतिम दर्शन के लिए निकल पड़ते हैं। कई वृद्धजन जो चल भी नहीं सकते, अपने परिजनों की मदद से मां के दर्शन को पहुंचते हैं, क्योंकि यह केवल एक विसर्जन नहीं, बल्कि भक्त और देवी के बीच एक अंतिम आत्मिक संवाद होता है।

श्रद्धालु अपनी थकान, दर्द, और बोझ को भुलाकर मां को अपने कंधों पर बैठा आगे बढ़ते हैं। मानो स्वयं मां उनके अंदर शक्ति भर रही हो। रास्ते भर पुष्पवर्षा होती है, श्रद्धा की वर्षा होती है और प्रेम की गंगा बहती है।

अंत में रामबान तालाब सोनपुरवा पहुंचकर विधि-विधान से मां गढ़ देवी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। तालाब के शांत जल में जब मां की प्रतिमा धीरे-धीरे विलीन होती है, तो वहां उपस्थित हर आंख नम हो जाती है। भक्तगण सिर झुकाकर मां से पुनः अगले वर्ष पधारने का आह्वान करते हैं।

यह परंपरा न केवल धार्मिक भावनाओं से जुड़ी हुई है, बल्कि यह हमें सामूहिकता, सेवा, और श्रद्धा का गहरा संदेश देती है। यह आयोजन बताता है कि जब आस्था सच्ची हो, तो देवी स्वयं अपने भक्तों के कंधों पर सवारी कर लोक से अलोक की यात्रा करती हैं।


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  • Pavan Kumar

    Location: Garhwa Pavan Kumar is reporter at आपकी खबर News from Garhwa

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