Location: रांची
रांची: पिछले वर्ष झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार के बाद से ही मैं यह लगातार लिख रहा था कि भाजपा को अगर झारखंड में फिर से अपना जनाधार मजबूत करना है तो उसे अपने मूल वोटरों को आगे करना होगा, उन्हें मौका देना होगा और उनका विश्वास जीतना होगा नहीं तो आगे की राह और कठिन होती चली जाएगी।
वैश्य समाज भाजपा का समर्थक है। झारखंड में वैश्य समाज, अगड़ी जाति और दलितों का एक बड़ा वर्ग भाजपा का साथ देता रहा है।
वर्ष 19 और 24 में हुए विधानसभा चुनाव में झारखंड की राजनीति में झारखंड मुक्ति मोर्चा नीत गठबंधन ने भाजपा को कड़ी चुनौती दी और सत्ता से बाहर कर दिया। झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में एक मजबूत गठबंधन बना। इस गठबंधन के साथ आदिवासी, ईसाई और मुस्लिम वोटर एकजुट हो गया। इन तीनों जातियों के साथ अन्य जातियों का भी झुकाव महागठबंधन की ओर हुआ। इसलिए भाजपा सत्ता से बाहर हो गई।
भाजपा ने आदिवासियों को अपने साथ लाने के तमाम प्रयास किए। कई नए प्रयोग किए गए। पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ और ओडिशा में आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन कोई फायदा नहीं मिला। आदिवासी साथ नहीं आए।
तब यह बात उठी कि अब यदि भाजपा को आदिवासी समाज का साथ नहीं मिल रहा है तब उसे अपने मूल वोटरों को एकजुट करना होगा। तभी बात बनेगी।
दो चुनावों में हार के बाद भाजपा अब अपनी पुरानी राह पर लौटती दिख रही है। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में आदित्य साहू का चयन इसी का नतीजा है। कई दूसरे प्रदेशों में भाजपा जब युवाओं को आगे कर रही है तब झारखंड में आदित्य साहू को प्रदेश अध्यक्ष बनाना यह साबित करता है कि झारखंड की राजनीति में भाजपा कुछ अलग कर रही है। यह अपना खोया हुआ जनाधार वापस लाने का प्रयास है।
प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी को जब विधायक दल का नेता चुना गया तभी यह साफ हो गया था कि प्रदेश अध्यक्ष किसी ओबीसी को ही बनाया जाएगा और अब यही हुआ। भाजपा ने ओबीसी समाज को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर एक बड़ा संदेश दिया है।
आदित्य साहू को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद यह भी साफ हो गया है कि रघुवर दास की भूमिका अब अलग से तय होगी। राष्ट्रीय टीम में उनको जगह मिल सकती है। पहले भी रघुवर दास राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुके हैं।
आदित्य साहू का चयन भाजपा ने बहुत सोच समझकर किया है। वह मिलनसार और जमीन से जुड़े हुए नेता हैं। लो प्रोफाइल में रहते हैं। कार्यकर्ताओं से उनका मधुर संबंध है। सर्व सुलभ हैं, इसलिए इसका लाभ पार्टी को मिलेगा। आदित्य साहू को लेकर प्रदेश के बड़े नेताओं में भी बहुत विरोध की स्थिति नहीं है। क्योंकि आदित्य साहू सबको लेकर चलने वाले नेता हैं।
भाजपा ने ऐसे समय आदित्य साहू के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी दी है जब पार्टी कठिन दौर से गुजर रही है। झारखंड में उसके सामने बड़ी चुनौती है। झामुमो की ताकत लगातार बढ़ रही है। अब देखना है आदित्य साहू कितने सफल अध्यक्ष होते हैं।












