रांची : नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री हो गई। निशांत की राजनीति में एंट्री विपरीत परिस्थितियों में हुई है। न नीतीश कुमार कभी चाहते थे कि निशांत राजनीति में आएं और न निशांत की इच्छा थी। नीतीश कुमार जीवन भर परिवारवाद की राजनीति का विरोध करते रहे। लेकिन स्थिति ऐसी बनी या बना दी गई कि बेटे को राजनीति में आना पड़ा। कहा तो यह भी जा रहा है कि जब नीतीश पर बेटे को राजनीति में लाने का दबाव पड़ा तो उन्होंने बिहार छोड़ने का ही कठिन फैसला ले लिया। परिवारवाद की राजनीति से दूर वह दिल्ली चले गए। बेटे के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी। जेडीयू की राजनीति अब निशांत के इर्द-गिर्द घूमेगी। पिछले दो दिनों में इसका संकेत मिल गया है।
निशांत पूरी तरह गैर राजनीतिक व्यक्ति हैं। राजनीतिक परिवार और माहौल में पैदा होने, पलने-बढ़ने के बावजूद राजनीति में उनकी कभी रुचि नहीं रही। पिछले कई वर्षों से जदयू के नेता उन्हें राजनीति में लाने का प्रयास करते रहे। लेकिन वह तैयार नहीं हुए। नीतीश कुमार ने भी कभी उन्हें कहा नहीं। अब ऐसी स्थिति में उनकी राजनीति में एंट्री हुई है जब न केवल जदयू का अस्तित्व बल्कि बिहार की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर है जहां से निकलना कठिन है। चुनौती गंभीर है। अपने भी साजिश में शामिल हैं। शकुनी की भूमिका में हैं। शतरंज की चाल में फंसाने की योजना है। नीतीश कुमार इस साजिश के शिकार हुए हैं।
राजनीति में जब आपकी दिलचस्पी नहीं हो, आप तीन तिकड़म न जानते हो, अपने पराए की पहचान न हो तो रास्ता और कठिन हो जाता है। न केवल राजनीति बल्कि किसी भी क्षेत्र में जब आपकी दिलचस्पी नहीं होगी, आप जबरन थोपे जाएंगे तो सफलता नहीं मिलेगी। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं।
निशांत की एंट्री कठिन परिस्थितियों में हुई है, इसलिए उनके सामने चुनौती बड़ी है। इस चुनौती से वह कैसे मुकाबला करेंगे, अपने को कैसे साबित करेंगे यह देखना होगा। उन्हें अग्नि परीक्षा देनी है। इस परीक्षा से या तो निकल जाएंगे या फिर भस्म हो जाएंगे। राजनीति का कोई अनुभव इनके पास नहीं है। निशांत युवा हैं और जदयू का भविष्य अब इन्हीं के हवाले है।
राजनीति में परिवारवाद कोई नई बात नहीं है। राजनीतिक दलों में परिवारवाद की भरमार है। क्षेत्रीय दल तो परिवारवाद के सबसे बड़े
हितैषी और पोशाक हैं। राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू यादव ने अपने दोनों बेटे को राजनीति में उतारा। लेकिन क्या तेजस्वी या तेज प्रताप लालू यादव बन पाए। अपनी पार्टी है इसलिए चल रहे हैं नहीं तो कब का विदा हो गए होते। हालांकि कई अच्छे उदाहरण भी हैं।
नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में निशांत आगे बढ़ेंगे। राजनीति के मंच पर जब वह आएंगे, जनता से संवाद करेंगे तो पता चलेगा उनके अंदर कितनी क्षमता व काबिलियत है। बहरहाल निशांत को बहुत बधाई। बिहार की जनता की उम्मीदों पर खरे उतरें यही शुभकामना है।











